
बिना चादर के मरीज
जिला अस्पताल में अव्यवस्था और लापरवाही का आलम थमने का नाम नहीं ले रहा। मरीजों के पलंगों पर चादर तक नहीं बिछाई जा रही हैं। चौथे माले पर ट्रॉमा वार्ड में भर्ती मरीज को बिना चादर के ही इलाज मिल रहा है। यही हाल अन्य वार्डों का भी है। मरीजों को घर से चादर मंगवाकर काम चलाना पड़ रहा है।
वर्ष 2019 में जिला अस्पताल को मैकेनाइज्ड लॉन्ड्री की सौगात मिली थी। योजना के अनुसार, प्रत्येक दिन अलग रंग की चादर बिछाने का नियम था सोमवार को गोल्डन यलो, मंगलवार को आसमानी, बुधवार को लाल, गुरुवार को लेमन यलो, शुक्रवार को ब्रिलिएंट रेड, शनिवार को चॉकलेट और रविवार को हरे रंग की चादर। लेकिन अब हालात यह हैं कि बेड पर चादर ही नहीं मिल रही।
जानकारी के अनुसार, अस्पताल के 300 बेड के हिसाब से 2100 रंगीन और सफेद चादरें मंगाई गई थीं, जिन पर लगभग 10 लाख रुपए खर्च किए गए। फिर भी मरीजों को चादरें नसीब नहीं हो रहीं। पहले सात रंगों की व्यवस्था ने अस्पताल की छवि निखारी थी, लेकिन अब चादरें दिखना ही बंद हो गई हैं।लॉन्ड्री स्टाफ लापरवाह
लॉन्ड्री भवन पर शासन ने 40 लाख रुपए खर्च किए हैं। करीब 3500 वर्गफीट क्षेत्र में बने इस भवन में सात कमरे, हॉल, टॉयलेट समेत कपड़े धोने, प्रेस करने और रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था है। तीन कर्मचारी यहां पदस्थ हैं, इसके बावजूद मरीजों को चादरें नहीं दी जा रहीं।
मरीजों को स्वच्छ वातावरण देना हमारी पहली प्राथमिकता है। अस्पताल में चादर न देना बेहद शर्मनाक है। मैं सिविल सर्जन को तलब कर रहा हूं, जल्द ही मरीजों को फिर से चादरें उपलब्ध कराई जाएंगी।
डॉ. आरपी गुप्ता, सीएचएमओ
Published on:
29 Jul 2025 10:42 am
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