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बदहाल हो चुके हथकरघा उद्योग को मदद मिले तो 6 गांव के लोगों को मिले रोजगार

प्रवासियों को रोजगार दिलाने के साथ कुटीर उद्योग को किया जा सकता है पुर्नजीवित

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Cottage industry can be revived

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हरपालपुर। कोरोना अनलॉक के दौर में एक महीना गुजर जाने के बाद भी जिले के बुनकरों का हथकरगा कारोबार बंद पड़ा है। लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये शासन द्वारा तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं। फिर भी जिले में हथकरघा उद्योग एवं बुनकरों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यही कारण हैं कि कुटीर उद्योग के तहत आने वाला हथकरघा उद्योग सरसेड़ में दम तोड़ रहा हैं। बुनकर हथकरघा उद्योग छोड़ मजदूरी करने को मजबूर हो रहे हैं। लॉक डाउन में जब बड़े शहरों से लोग गांव की ओर पलायन करने लगे तो कुटीर उद्योगों के जरिए बेरोजगारी दूर करने की योजना बनाई गई, लेकिन योजना के तहत जिले के हथकरघा व्यवसाय को प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा है।

पहले हर घर में चलता था हथकरघा
हरपालपुर के नजदीक सरसेड़ गांव में कभी गालियों में हथकरघा चलने की खट-खट की आवाज पूरे दिन गूंजती रहती थी। लेकिन अब हथकरघा का काम एक दो घरों तक सीमति रह गया है। पलायन के बाद गांव लौटे लोगों में से एक-दो लोग ही पैतृक धंधे की ओर वापसी कर रहे हैं। हथकरघा समितियों को शासन की ओर से विशेष आर्थिक मदद न मिलने ये बुनकर बदहाल स्थिति में जीवन यापन करने को मजबूर है। इसलिए प्रवासी इस काम से कतरा रहे हैं। कभी सूती कपड़े बनाने वाले ये हथकरघा कारीगर अब केबल गमछा एवं चादर बनाने के काम तक सीमित हो गए हैं। समिति को मिलने वाले शासकीय आर्डर पर एक बुनकर महीने भर में 5 हजार रुपए से अधिक नहीं कमा पा रहे हैं। जो दिहाड़ी मजदूरी से भी कम पड़ रही है। सरसेड़ निवासी राजेश अनुरागी ने बतलाया कि लॉक डाउन के दौरान आर्डर नहीं मिलने से कर्ज लेकर परिवार खर्च चलाया अब ऑनलॉक वन में चादर बनाने के काम मिला है। एक चादर के 80 रुपए मिलते हैं, महीने में 5 से6 हजार रुपए तक की ही कमाई हो पा रही है। गोविंद दास कोरी का कहना है कि लॉक डाउन के कारण हम बुनकरों को स्थिति और भी बदतर हो गई है। उन्होंने बताया कि वे 90 दिनों बाद पहला चादर बना रहे हैं।

आधुनिक मशीनों की योजना ठंडे बस्ते में
सरसेड़ गांव में बुनकरो के लिए शासन द्वारा योजना के तहत मदद कर हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक भवन बनवाया गया था, जिस में आधुनिक पावरलूम मशीनें लगनी थी, लेकिन समिति अध्यक्ष व जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते ये भवन धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रहा है। न केवल सरसेड़, कैथोकर, परेथा, भदर्रा, रानीपुरा, कैमाहा गांव में हथकरघा कारोबार बंद होने की कगार पर हैं। बुनकर मजदूरी करके परिवार पाल रहे हैं।

शासन ध्यान दे तो 6 गांव के लोगों को मिले रोजगार
प्रवासियों को रोजगार दिलाना शासन की प्राथमिकता में है। ऐसे में सरसेड़ इलाके के हथकरघा उद्योग को सपोर्ट कर न केवल हथकरघा उद्योग को पुर्नजीवित किया जा सकता है, बल्कि आसपास के 6 गांव के लोगों को स्थाई रोजगार दिलाया जा सकता है। आधुनिक मशीनें लगाने की योजना पूरी होती है तो बाजार की प्रतिस्पर्धा में भी बुनकर टिके रह सकेंगे।

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