
सुलग रहे अवैध ईंट भट्टे
मध्य प्रदेश सरकार एक तरफ जहां अंकुर अभियान और व्यापक पौधारोपण के जरिए पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं छतरपुर जिले में इसकी जमीनी हकीकत बेहद खौफनाक और विरोधाभासी है। छतरपुर शहर और उसके आसपास के ग्रामीण अंचलों में नियमों और कायदों को पूरी तरह ताक पर रखकर ईंट भट्टों का अवैध काला कारोबार धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। इन भट्टों की चिमनियों और खुले मैदानों से चौबीसों घंटे निकलने वाला जहरीला और दमघोंटू धुआं न केवल पर्यावरण के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है, बल्कि स्थानीय नागरिकों के फेफड़ों में धीमे जहर की तरह उतर रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि शहर की आबोहवा अब सांस लेने लायक नहीं बची है।
पिछले कुछ वर्षों में सूबे की सरकार ने वायु प्रदूषण के स्तर को सुधारने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को स्पष्ट हिदायत दी गई है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली औद्योगिक इकाइयों, फैक्ट्रियों और धुआं उगलने वाले वाहनों पर तत्काल और सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
लेकिन बड़ा और यक्ष प्रश्न यह उठता है कि आखिर छतरपुर में ईंट भट्टों के खिलाफ आज तक कोई ठोस और प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? शहर के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा घेरा बन गया है जहां नियमों की कोई बिसात नहीं है। यदि हम शहर के प्रमुख मार्गों और बाहरी इलाकों पर नजर डालें, तो स्थिति बेहद डरावनी नजर आती है।
सागर रोड और महोबा रोड- इन दोनों व्यस्ततम मार्गों के किनारे कई भट्टे बिना किसी वैध अनुमति के संचालित हो रहे हैं।
नारायणपुरा और सौरा रोड- रिहायशी इलाकों के बेहद करीब स्थित ये भट्टे रात-दिन धुआं उगल रहे हैं।
देरी रोड और ढड़ारी क्षेत्र- इन क्षेत्रों में तो स्थिति यह है कि बस्तियों और खेतों के बीच ही भट्टे लगा दिए गए हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, छतरपुर के मुख्य शहरी क्षेत्र के भीतर आधा दर्जन से अधिक और शहर की बाहरी सीमा से लगे 5 किलोमीटर के दायरे में आने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग दो दर्जन (24 से ज्यादा) ईंट भट्टे पूरी तरह सक्रिय हैं। नियमों के मुताबिक इन्हें आबादी से काफी दूर होना चाहिए था, लेकिन यहां अधिकांश भट्टे घनी आबादी, स्कूल और सार्वजनिक स्थलों के ठीक बगल में सीना ताने खड़े हैं।
विशेषकर ढड़ारी, ललौनी, और गठेवरा जैसे ग्रामीण इलाकों में तो जैसे नियमों का जनाजा ही निकल चुका है। यहां सुबह से लेकर रात तक आसमान में काले धुएं का एक मोटा गुबार छाया रहता है, जो हवा के रुख के साथ छतरपुर शहर के भीतर प्रवेश करता है। इससे शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स लगातार खतरनाक स्तर की ओर बढ़ रहा है।
स्थानीय निवासी प्रेमचंद्र साहू, मन्नू साहू और दिनेश कुशवाहा का कहना है इन ईंट भट्टों में सिर्फ लकड़ी नहीं जलाई जाती। लागत कम करने के लिए भट्टी संचालक कोयले के साथ-साथ खराब रबर के टायर, गीली लकडिय़ां, लकड़ी का बुरादा, नमक और बेहद खतरनाक रासायनिक पदार्थों (केमिकल्स) को ईंधन के रूप में झोंक रहे हैं। इससे निकलने वाली गंध और धुआं पूरी तरह जानलेवा है।
प्रभावित क्षेत्रों की महिलाओं और युवाओं का दर्द भी कम नहीं है। स्थानीय निवासी कस्तूरी अहिरवार और वैभव कुशवाहा ने बताया कि इस जहरीले माहौल के कारण अब बस्तियों में बीमारियां पैर पसार चुकी हैं।
श्वास संबंधी गंभीर बीमारियां- बच्चों और बुजुर्गों में अस्थमा और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस के लक्षण दिख रहे हैं।
आंखों में लगातार जलन- धुएं के बारीक कणों के कारण लोगों की आंखों में लालिमा और जलन की समस्या आम हो चुकी है।
घुटन और घबराहट- सुबह और शाम के समय हवा भारी हो जाने से लोगों का दम घुटने लगता है।
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि उन्होंने इस संबंध में जिला प्रशासन से लेकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय तक लिखित और मौखिक शिकायतें कीं, लेकिन रसूखदार भट्टा संचालकों के आगे अधिकारियों ने अपनी आंखें और कान पूरी तरह बंद कर रखे हैं।
सरकारी दस्तावेजों और एनजीटी के नियमों के अनुसार ईंट भट्टा संचालन के लिए बेहद कड़े कानून तय हैं।
नियम और मापदंड छतरपुर में जमीनी हकीकत
स्थान का चयन- आबादी क्षेत्र, स्कूल, अस्पताल और नदी-नालों से निश्चित दूरी पर होना अनिवार्य है।
प्रदूषण बोर्ड की अनुमति- संचालन से पहले पर्यावरणीय क्लीयरेंस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी जरूरी है।
मिट्टी खनन की अनुमति- भट्टी के लिए मिट्टी निकालने हेतु खनिज विभाग की रॉयल्टी और अनुमति अनिवार्य है।
इस पूरे मामले में स्थानीय प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका सबसे ज्यादा संदेहास्पद है। एक तरफ जहां विभाग के आला अफसर विश्व पर्यावरण दिवस और अन्य मौकों पर कागजी जागरूकता रैलियां निकालकर अपनी पीठ थपथपाते हैं, वहीं दूसरी तरफ नाक के नीचे चल रहे इस विनाशकारी खेल पर मौन साध लेते हैं। क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि इन अवैध संचालकों को या तो किसी बड़े सफेदपोश (राजनैतिक) का वरदहस्त प्राप्त है, या फिर भ्रष्टाचार के चलते प्रशासनिक तंत्र ने इसे अपनी कमाई का जरिया बना लिया है।
ईंट भट्टों के संचालन के लिए किए जा रहे अवैध उत्खनन के मामलों को पूरी तरह संज्ञान में लिया जाएगा। जहां भी बिना अनुमति या नियमों के विपरीत काम हो रहा है, वहां खनिज विभाग की टीम भेजकर जांच कराई जाएगी और सख्त कार्रवाई होगी। इसके साथ ही, पर्यावरण नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी आवश्यक कार्रवाई के लिए लिखा जाएगा।
अमित मिश्रा, उप संचालक, खनिज
Updated on:
18 Jun 2026 11:06 am
Published on:
18 Jun 2026 11:06 am
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