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यहां होती है कुतिया महारानी की पूजा, मुराद होती है पूरी

आस्था का केंद्र बना कुतिया महारानी का मंदिर

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kutiya maharani mandir village pooja aastha bundelkhand

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उन्नत पचौरी/महेश आर्या
छतरपुर/मऊरानीपुर। बुंदेलखंड में पेड़ पौधों को पूजने और जानवरों की पूजा जाने की तमाम परंपराएं हैं। लेकिन झांसी जिले के मऊरानीपुर से करीब 15 किमी दूर ग्राम रेवन गांव में एक कुतिया का मंदिर है। जहां पर आस पास के क्षेत्र के साथ साथ दूर दूर से लोग यहां पर पूजा अर्चना करने के लिए बड़ी ही आस्था के साथ आते हैं। वहीं विभिन्न त्योहारों में वहां पर भजन कीर्तन व भेज भंडारा आदि भी किया जाता है। लोगों का मानना है कि इस मंदिन में आन वाले लोगों की मनोकामनाऐं पूरी होती हैं।
मऊरानीपुर तहसील क्षेत्र के रेवन गांव और ककवारा के बीच में स्थित इस कुतिया महारानी के मंदिर में नवरात्री के दिनों में लोगों की भारी भीड़ जुट रही है। लोग यहां प आकर पूजा अर्चना के साथ साथ कन्या भोज, भजन कीर्तन आदि धार्मिक कार्यों का आयोजन करा रहे हैं। दोनों गांवों के बीच सड़क के किनारे एक चबूतरे पर काले रंग की कुतिया महारानी की मूर्ति स्थापित कर छोटा सा मंदिर बना है। जिसके प्रति आसपास के लोग बेहद आस्था रखते हैं। इस स्थान को लोग सिद्ध स्थान मानते हैं और ऐसा मानने के पीछे उनके अपने तर्क हैं। क्षेत्र के बुजुर्ग लोगों कहना है कि करीब एक सौ वर्ष पहले उसकी भूख से मौत हो गई थी। तब गांव के लोगों द्वारा उसका मंदिर बना दिया गया और लोगों की आस्था का केंद्र बन गया। इस मंदिर की कहानी बेहद मार्मिक है। रेवन गांव के पास ही ककवारा नाम का गांव है। स्थानीय लोग बताते हैं कि एक कुतिया दोनों गांवों में रहती थी। इसे रेवन ककवारा की कुतिया कहते थे। दोनों गांव के किसी भी कार्यक्रम में वह खाना खाने पहुंच जाती थी। एक बार कुतिया ककवारा गांव के बाहर टहल रही थी। तभी रेवन गांव से रमतूला के बजने की आवाज सुनाई दी। इस वाद्ययंत्र को बजाकर शाम को होने वाले आयोजन में भोजन के लिए आमंत्रित करने की परंपरा रही है। रमतूला की आवाज सुनते ही कुतिया खाना खाने के लिए रेवन गांव में पहुंच गई। लेकिन देर हो जाने के कारण सब लोग खाना खाकर उठ चुके थे। कुछ ही देर में ककवारा गांव से रमतूला की आवाज सुनाई दी। तो कुतिया खाना खाने के लिए वहां दौड़कर गई। लेकिन वहां भी भोजन नहीं मिला। क्षेत्र के रहने वाले निवासी सुधीर ने बताया रेवन ओर ककवारा की दूरी लगभग 3 किमी वह भेजन के चक्कर में दौड़ते दौड़ते भूख के कारण उसने दोनों गांव के बीच में ही दम तोड़ दिया। भूख से कुतिया की मौत हो जाने पर लोगों को बहुत पश्चाताप हुआ। इसके बाद दोनों गांव के लोगों ने मिलकर कुतिया को उसी जगह पर दफना दिया। तब उस स्थान मिट्टी से पत्थर में बदल हो गया। लोगों ने इस चमत्कार के बाद वहां पर एक छोटा सा मंदिर बना दिया। कुछ समय बाद वहां पर एक मूर्ति भी स्थापित कर दी। स्थानीय लोगों के अनुसार दीपावली पर यहां धूमधाम से पूजा अर्चना की जाती है। क्योंकि उसकी मौत इसी महीने में हुई थी। यह मंदिर और उससे जुड़ी कहानी बुंदेलखंड की त्रासदी को भी बयान करती है। यह मंदिर कुतिया महारानी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर पर नवरात्रि के समय अन्य देवी देवताओं की तरह जल चढ़ाने को महिलाऐं पहुंचती हैं। क्षेत्र वासियों को बहुत श्रद्धा है इस मंदिर से जो भी मुराद करो वह पूरी होती है इसी भाव से क्षेत्र के लोग त्योहारों पर इस कुतिया महारानी के मंदिर में पहुंचते है।
इनका कहना है
गांव में बना कुतिया महारानी का मंदिर करीब सौ वर्ष पहले बना था। यह मंदिर क्षेत्र के लोगों के आस्था का प्रतीक है। लोग त्योहारों में यहां पर कीर्तन भजन आदि कराते हैं और नवरात्री के दौरान यहां पर सुबह से भारी संख्या में लोग जल चढ़ाने आते हैं।
रामगापाल अहिरवार ग्राम प्रधान