विश्व रक्तदान दिवस
छतरपुर.जिला अस्पताल स्थिति 300 यूनिट ब्लड क्षमता वाले इस बैंक में फिलहाल 70 यूनिट ब्लड ही बचा है। जबकि इस अस्पताल में रोज की खपत 35 यूनिट रक्त की है। ब्लड बैंक में उपलब्ध रक्त भी शहर के युवाओं द्वारा डोनेट किया गया है। कम मात्रा में ब्लड का स्टॉक होने से सड़क हादसों में गंभीर घायल, जटिल ऑपरेशन और रक्त की कमी वाले रोगियों के लिए संकट खड़ा हो गया है। वहीं, जिला अस्पताल को 9 साल पहले 40 लाख लागत से मिली ब्लड सेपरेशन मशीन को अभी तक शुरु नहीं किया जा सका है। जिससे ब्लड के कंपोनेंट का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
जनसहयोग से चलता है ब्लड बैंक
वर्तमान मेंं ब्लड बैंक में सिर्फ 70 यूनिट ब्लड है, जो बहुत ही कम है। जबकि वर्तमान में ब्लड स्टॉक अन्य दिनों की अपेक्षा दोगुना है। जिला अस्पताल की ब्लड बैंक शहर के लोगों और समाज सेवियों के सहयोग से चलती है। ऐसी स्थिति में जरूरतमंद मरीजों को रक्त उपलब्ध कराने के लिए बाहर से डोनर बुलाना पड़ते हैं। हालांकि शहर में रक्तदान कर मदद करने वाले तीन ग्रुप सक्रिय है। जो मरीजों के लिए रक्तदाता खोजते हैं। लेकिन अभी भी रक्तदान करने वालों की संख्या जरूरत के हिसाब से कम है।
आसपास के जिलों का भी भार
जिले में एक मात्र ब्लड बैंक जिला अस्पताल में है, इस अस्पताल पर शहर के सभी निजी अस्पतालों सहित आसपास के महोबा, टीकमगढ़ व पन्ना जिले के मरीज भी निर्भर हैं। बैंक में पर्याप्त ब्लड न होने से मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। रक्त की कमी से परेशान मरीजों के परिजन परेशान होकर या तो महंगे दाम देकर ब्लड की जुगाड़ करते हैं या फिर रिप्लेस के जरिए ब्लड जुटाते हैं। इन प्रयासों के बाद भी ब्लड न मिलने पर जब मरीजों की जिंदगी पर संकट बढ़ता है तो इस समस्या का फायदा उठाकर यहां बड़ी संख्या में दलाल भी सक्रिय हैं
जरूरत के हिसाब से रक्तदान कम हो रहा है
एक माह में निशुल्क और बदलने वाले ब्लड को मिलाकर करीब 1050 यूनिट की खपत होती है, जबकि रक्तदान करने वालों की संख्या कम है। यदि इसी हिसाब से लोग रक्तदान करते रहें तो समस्या अपने आप हल हो जाएगी। नए भवन में ब्लड सेपरेशन मशीन शुरु हो जाए, तो ब्लड के चारों कंपोनेंट का अलग-अलग इस्तेमाल होगा, जिससे ब्लड की खपत कम होगी और मरीजों की समस्या भी हल हो जाएगी। ब्लड बैंक में रोजाना लगभग 5 से 7 लोग स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं। जिससे मिलने वाला ब्लड ही जरुरत पडऩे पर मरीज के काम आता है। इन स्वैच्छिक रक्तदाताओं की बदौलत ही मरीजों की जान बचाई जा रही है। इसके अलावा सालभर में दो या तीन संस्थाएं 20 से 30 यूनिट बल्ड कैंप के जरिए डोनेट करती हैं।
डोनर को नहीं मिलती सुविधाएं
ब्लड बैंक में रक्त डोनेट करने वाले दानदाताओं को सर्टीफिकेट नहीं मिलने से लोगों को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। न ही दानदाताओं को डोनर कार्ड या नंबर मिल रहा है। जिससे लोग रक्तदान में कम रुचि दिखा रहे हैं। डोनर नंबर या सर्टीफिकेट होने पर डोनर या उसके परिजन को जब भी ब्लड की जरुरत होती है, तो उन्हें प्राथमिकता मिलती है। लेकिन डोनर कार्ड न होने से रक्तदाताओं को इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पाता है, जिससे लोग रक्तदान के लिए उदासीन हो रहे हैं। ब्लड बैंक में रक्त की कमी होने से मरीज को जरुरत पडऩे पर एक्सचेंज करने पर ही ब्लड मिल पा रहा है। लेकिन जिस ब्लड ग्रुप का रक्त स्टॉक में नहीं है, उसकी डिमांड होने पर भी मरीज के परिजन को टाला जाता है।
कम लगते हैं कैंप
ब्लड बैंक में सभी ग्रुपों के ब्लड की उपलब्धता के लिए शासन द्वारा कैंप लगाए जाने के लिए बजट मिलता है, लेकिन शिविर लगाने में लापरवाही की जा रही है। मरीज के परिजन ब्लड की आवश्यकता के लिए आते हैं। उन्हें ही ब्लड एक्सचेंज करने के लिए कहा जाता है। इसके अलावा ब्लड बैंक के प्रभारी पैथलॉजिस्ट कलेक्टर या सीएमएचओ के जरिए शिविर लगाकर ब्लड की कमी दूर करने का कोई प्रयास भी नहीं करते हैं। कैंप के नाम पर संस्थाओं द्वारा लगाए गए शिविर से ही ब्लड मिल पाता है। इसके अलावा शहर के लोगों और समाज सेवियों के सहयोग से ब्लड बैंक चलता है।
फैक्ट फाइल
ब्लड ग्रुप उपलब्ध यूनिट
ओ पॉजिटिव 07
ओ निगेटिव 00
बी पॉजिटिव 12
बी निगेटिव 05
ए पॉजिटिव 132
ए निगेटिब 1
एबी पॉजिटिव 13
एबी निगेटिव 00
कुल यूनिट- 70