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महाराजा भवानी सिंह के नाम की फर्जी रजिस्ट्री का पूरा सच आया सामने, एेसा हुआ था रजिस्ट्री अॉफिस में

रजिस्ट्रार ऑफिस के रिकॉर्ड में फर्जी रजिस्ट्री दर्ज करवाने का मामला

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Maharaja Bhavani Singh Name Bogus registry The whole truth

Maharaja Bhavani Singh Name Bogus registry The whole truth

छतरपुर। रियासत छतरपुर के अंतिम तिलकधारी महाराज स्व. भवानी सिंह जूदेव के फर्जी हस्ताक्षर से तैयार कराई गई बेशकीमती जमीन की फर्जी रजिस्ट्री के मामले कीें जांच पूरी हो गई है। शासन स्तर पर प्राइवेट एजेंसी से 13 बिंदुओं पर कराई गई जांच में पाया गया है कि जिस पंडा वाला मकान की फर्जी रजिस्ट्री तैयार करवाकर रजिस्ट्रार ऑफिस के रिकॉर्ड में लगवाई गई थी, वह मकान महल रोड पर है ही नहीं और न ही यह मकान कभी बेंचा गया है। महाराजा साहब की निजी प्रॉपर्टी में यह मकान आज भी शामिल है, जो बैनीगंज मोहल्ला में स्थिति है और पीडब्ल्यूडी व रामप्रसाद पंडा के बीच कोर्ट में इस मकान के आधिपत्य को लेकर केस चल रहा है। इस पूरे मामले में जांच एजेंसी इस बात से हैरान थी कि जो मकान कभी बिका नहीं, उसकी फर्जी रजिस्ट्री बनाकर दूसरे स्थान पर उसे दर्शा दिया गया और फिर एक के बाद एक रजिस्ट्रियां होती चली गईं। इस मामले में रजिस्ट्रार ऑफिस से लेकर राजस्व विभाग के अफसरों की भूमिका पर सवाल खड़े हुए हैं।

जांच में यह तीन बड़े तथ्य आए सामने :

1. स्तुतिप्रसाद ईसाई का मकान बना दिया पंडा वाला हाउस :
जांच में पाया गया कि छतरपुर निवासी स्तुतिप्रसाद ईसाई नाम की महिला को महाराजा भवानी सिंह जूदेव ने खसरा नंबर 2583 में दर्ज अपने निजी स्वामित्व का मकान महल रोड स्थित मकान दिया था। 21 नवंबर 1958 में महाराजा भवानी सिंह ने खुद स्तुतिप्रसाद ईसाई के नाम से इस मकान की रजिस्ट्री की थी। इस मकान का विधिवत नामांतरण भी नगरपालिका में सन् 1975 में स्तुतिप्रकाश के नाम से हो गया था। रजिस्ट्रार ऑफिस से लेकर राजस्व रिकॉर्ड में आज भी इनके नाम से यह भवन दर्ज है। स्तुतिप्रसाद ईसाई के वारिसान उनके नाती सुबोधदास ईसाई के नाम से नगरपालिका के संपत्तिकर रजिस्ट्रर में आज भी यह मकान दर्ज है और वे टैक्स भी भरते आ रहे हैं। इस मकान पर पूर्व में रियाज अहमद नाम के व्यक्ति ने दावा जताया था, जिस पर प्रथम व्यवहार न्यायालय वर्ग दो छतरपुर के कोर्ट में इसका केस चला था। 2016 में तत्कालीन जज सदाशिव दांगौडे ने भवन की रजिस्ट्री और अन्य सभी साक्ष्यों से सहमत होकर सुबोधदास के पक्ष में फैसला देते हुए यह मकान स्तुतिप्रसाद ईसाई का होना पाया था। लेकिन दूसरी तरह इसी मकान को बेहद चालकी से भू-माफियाओं ने पंडा वाला मकान साबित करने फर्जी रजिस्ट्री तैयार कराकर सौदेबाजी कर डाली।
2. पंडा वाला मकान के नाम पर होती चली गई रजिस्ट्रियां :
जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि बेशकीमती जमीन को ठिकाने लगाने के लिए बेहद चालाकी से बड़ा खेल खेला गया। पंडा वाला मकान के नाम से 5 दिसंबर 1957 की फर्जी रजिस्ट्री तैयार कराई गई। इसमें पंडा वाला मकान भारत सरकार द्वारा महाराजा भवानी सिंह जू देव को प्राप्त होना दर्शाया गया है। जबकि पंडा वाला हाउस निजी है। यह हाउस महाराजा भवानी सिंह जू देव ने नरसिंहगढ़ पुरवा निवासी रामदास शुक्ला को दिया था। लेकिन इस हाउस पर कामता पंडा का कब्जा था। रजिस्ट्री में यह खेल करने के बाद महल रोड पर स्थित स्तुतिप्रकाश ईसाई के मकान को पंडा वाला मकान दर्शा दिया गया। जबकि महाराजा भवानी सिंह जू देव की निजी प्रॉपर्टी में शामिल पंडा वाला मकान आज भी बैनीगंज मोहल्ला में स्थित है। यह मकान कभी बेंचा ही नहीं गया। आज भी रामप्रसाद पंडा और पीडब्ल्यूडी के बीच पंडा वाले मकान के आधिपत्य को लेकर कोर्ट में केस चल रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब पंडा वाला मकान को लेकर कोर्ट में केस चल रहा है तो, उसी मकान के नाम पर रजिस्ट्रियां और सौदेबाजी कैसे होते चली गई।
3. फर्जी रजिस्ट्री के आधार पर ऐसे शुरू हुआ खेल :
जांच में निकले तथ्य के अनुसार महाराजा भवानी सिंह जू देव के नाम की फर्जी रजिस्ट्री के बाद बेशकीमती जमीन को हथियाने का जो खेल खेला गया, उसमें ही फर्जीबाड़ा करने वाले लोग चूक करते चले गए। फर्जी रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रति राजेंद्र बरसैंया ने रजिस्ट्रार ऑफिस से निकलवाई थी। इसके बाद उन्होंने 19 दिसंबर 1997 में कैलाश शंकर खरे से 647 वर्ग फीट वाला मकान खरीदा। लेकिन रजिस्ट्री 1164.30 वर्ग फीट जमीन की हुई। जबकि फर्जी रजिस्ट्री के नक्शा में भी इतनी जमीन नहीं थी। इस जगह का नामांतरण भी नहीं था, लेकिन बिना नामांतरण के रजिस्ट्री हो गई और 11 64.30 वर्ग फिट जमीन की रजिस्ट्री को बिना जांच-पड़ताल किए रजिस्ट्रार ऑफिस में पंजीबद्ध कर लिया गया। एक बार यह पूरी जमीन बिक जाने के बाद दूसरी बार फिर इसी जमीन का नामांतरण कैलाश शंकर खरे के नाम से सन् 2000-2001 में नगरपालिका में कराया गया। नामांतरण के बाद 6 सितंबर 2001 में उसी 647 वर्ग फीट के भूखंड को अखिलेश सोनी पिता रामेश्वरदयाल सोनी को बेच दिया गया। लेकिन 647 की जगह 737 वर्ग फीट की रजिस्ट्री कर दी गई। जबकि महाराज साहब की फर्जी रजिस्ट्री में भी यह जमीन 9.10 वर्ग फीट बताई गई थी। लेकिन फर्जीबाड़ा में भी नया फर्जीबाड़ा करते हुए अखिलेश सोनी के नाम मु य रोड पर 13 फीट दर्शाकर जमीन की रजिस्ट्री कर दी गई। इसके बाद 15 अक्टूबर 2010 को अखिलेश सोनी से रामस्वरूप विश्वकर्मा ने इसी जमीन की रजिस्ट्री करा ली। यह सब पूरा खेल स्तुतिप्रकाश के मकान को हथियाने के लिए खेला गया।
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5-10 रुपए के स्टांप से पकड़ा गया खेल :
प्राइवेट एजेंसी ने रजिस्ट्रार ऑफिस के रिकॉर्ड की जांच पड़ताल के बाद इस पूरे फर्जीबाड़ा का काला सच सामने ला दिया। जो इस प्रकार है...
1. उप पंजीयक कार्यालय के रिकॉर्ड में लगवाई गई फर्जी रजिस्ट्री का सच उसमें लगाए गए 5 और 10 रुपए के स्टांप के कारण पकड़ा गया। सन् 1957 की फर्जी रजिस्ट्री तैयार करने के लिए उसमें 5 और 10 रुपए के स्टांप लगाए गए हैं। पूरी रजिस्ट्री टाइप राइटर से लिखी गई है। जबकि उस समय न तो इतनी राशि के स्टांप चलते थे और न ही टाइपराइटर बना था। रजिस्ट्रियां हाथ से ही लिखी जाती थी। इस फर्जीवाड़े का खुलासा रजिस्ट्रार ऑफिस के रिकॉर्ड में दर्ज एक अन्य रजिस्ट्री से मिलान के बाद हुआ। 5 दिसंबर 1957 की तारीख वाली इस फर्जी रजिस्ट्री के 2 माह 21 दिन पहले की तारीख में शेख हसन वल्द शेखलाल मुह मद की एक रजिस्ट्री शेखन की बगिया की हुई थी। इस रजिस्ट्री को हाथ से लिखा गया था। इसमें 1 रुपए, आठ आना, चार आना और दो आना के स्टांप लगे थे। इसी से फर्जीवाड़ा पकड़ गया कि जो रजिस्ट्री फर्जी तैयार कराई गई उसमें 5 और 10 रुपए के स्टांप कैसे लग गए, जबकि इतनी राशि के स्टांप चलन में ही नहीं थे। वहीं रजिस्ट्री लेखक के हस्ताक्षर भी फर्जी थे। रजिस्ट्रार से लेकर महाराजा भवानी सिंह तक के हस्ताक्षर फर्जी बनाए गए थे।
2. रजिस्ट्रार कार्यालय के रिकॉर्ड में जो भी रजिस्ट्री होती है उसे इंट्री रजिस्टर जिसे ग्रंथ कहते हैं, में दर्ज किया जाता है। अंगूठा पत्री में भी दर्ज किया जाता है। लेकिन महाराजा भवानी सिंह के नाम की यह फर्जी रजिस्ट्री न तो ग्रंथ में दर्ज है और न ही अंगूठा पत्री में दर्ज है। इसमें कोई सील भी नहीं है। रजिस्ट्री के त तीश भी नहीं है। सब रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर भी फर्जी पाए गए।

फर्जीवाड़ा का सच सामने आ गया है,अब कोर्ट निर्णय करे :
इस पूरे फर्जीवाड़ा में जो भी लोग शामिल थे, उनके खिलाफ एफआइआर होना चाहिए। रजिस्ट्रार ऑफिस को गुमराह करके गलत नक्शा देकर जिन भी लोगों ने यह खेल किया है, उन्हें कोर्ट से जरूर सजा मिलनी चाहिए। रजिस्ट्रार ऑफिस में रिकॉर्ड बदलवाने के मामले की जांच की जा रही है। हमारे यहां का जो भी कर्मचारी इसमें शामिल रहा उसके बारे में पता लगाया जा रहा है।
- जीके तिवारी, उप पंजीयक, छतरपुर