
Chhatarpur
छतरपुर। बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल के संघर्षशील जीवन और ऐतिहासिक शौर्यगाथाओं को भले ही देश के इतिहास में वह स्थान नहीं मिल पाया हो, लेकिन बुंदेलखंड के छतरपुर जिले के लोगों ने महाराजा छत्रसाल के प्रति अपनी आस्था अनोखे तरीके से प्रकट की है। बुंदेलखंड केशरी के प्रति यहां के लोगों ने जो सम्मान जताकर इतिहास रचने का काम किया है उसे पूरे देश में सम्मान मिला है।
यही कारण है कि एक करोड़ दस लाख रुपए की लागत से अष्ठधातु की प्रतिमा के निर्माण में पूरे देश के लोगों ने सहयोग किया। केवल ६७ लाख रुपए से ज्यादा की नगद राशि 10-10 रुपए के कूपन से ही एकत्र हो गई। आने वाली 21 मार्च को बुंदेलखंड का सबसे बड़ा आयोजन छतरपुर में हो रहा है। इस पूरे आयोजन की पृष्ठभूमि कैसे तैयार हुई इसको लेकर अभी भी लोगों को इस बारे में जानकारी नही है। पत्रिका ने महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा निर्माण को लेकर तीन साल पहले हुई शुरुआत से लेकर अब तक के सफर की पड़ताल की तो कई अनछुए पहलु निकलकर सामने आए हैं।
महाराजा छत्रसाल के जीवन से जुड़ी वीरगाथाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए छतरपुर जिले में बड़ा काम हुआ है। महाराजा छत्रसाल स्मृति शोद्य संस्थान के माध्यम से साहित्य निर्माण, व्याख्यान, नाटक, प्रतियोगिताओं, जीवन चित्र प्रदर्शनी, राष्ट्रगौरव जागरण कार्यक्रम से लेकर नाटय मंचन तक की गतिविधियां पिछले तीन-चार सालों से जल रहीं हैं। इसके साथ ही छतरपुर के मऊसहानिया में ५२ फिट ऊंची महाराजा छत्रसाल की अष्ठधातु की प्रतिमा के निर्माण का काम भी चलता रहा। छतरपुर में सबसे पहले इस प्रतिमा का मास्टर पीस तैयार किया गया था। जिसको देखकर ही लखनऊ के कलाकारों ने मिट्टी से ५२ फिट ऊंची प्रतिमा तैयार की थी। उसी प्रतिमा की डाई बनाकर अष्ठधातु की प्रतिमा की ढलाई की गई।
छतरपुर के कलाकार की कल्पना को लखनऊ में मिला आकार :
देश में इतिहास बनने जा रही महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा के मूल स्वरूप को किसने बनाया, इसको लेकर सभी के मन में उत्सुकता है। लेकिन यह कम ही लोगों को पता है कि प्रतिमा का मूल स्वरूप छतरपुर में ही बनवाया गया है। छतरपुर के युवा आर्टिस्ट दिनेश कुमार शर्मा ने डॉ. पवन तिवारी के कहने से प्रतिमा का मास्टर पीस तैयार किया था। करीब डेढ़ फिट लंबे मास्टर पीस को लखनऊ ले जाया गया था। उसी पीस को देखकर लखनऊ के कलाकारों ने मिट्टी का मॉडल तैयार किया था। उकसे बाद उस मॉडल पीस के करीब सौ टुकड़ों में डाई बनाई गई। इन डाई को ट्रकों से छतरपुर लाया गया, जिनसे यहां पर राजस्थान के कारीगरों ने मूर्ति की ढलाई की।
एक बड़े संकल्प ने जोड़ दिया पूरे देश को :
महाराजा छत्रसाल की विशाल प्रतिमा बनाने के बड़े लक्ष्य के पीछे एक व्यक्ति की सोच थी। डॉ. पवन तिवारी, जो पूर्व में छतरपुर जिले में आरएसएस के विभाग प्रचारक थे। उस दौरान उन्होंने महाराजा छत्रसाल की जीवनी को पढ़ा, उनके बारे में निकट से जाना और जब उन्हें लगा कि महाराजा छत्रसाल ने बुंदेलखंड के लिए जितना अधिक संघर्ष किया उतना स्थान उन्हें भारत के इतिहास में नहीं मिला। यह बात जब उन्हें चुभी तो उन्होंने २ जून २०१५ को महाराजा छत्रसाल स्मृति शोद्य संस्थान का गठन करवाया। इसके बाद महाराजा छत्रसाल के इतिहास, त्याग, बलिदान की गाथाओं की पुस्तकें निकलवाई, कैलेंडर, डायरी, प्रतियोगिता से लेकर हर वह पहल शुरू की जिससे घर-घर में लोग छत्रसाल की वीरता की गाथाएं जान सकें। इसके बाद एक पूरे अभियान को समग्र रूप देते हुए उन्होंने महाराजा छत्रसाल की अष्ठधातु से निर्मित विशाल प्रतिमा स्थापना का संकल्प खड़ा किया। इस संकल्प से न सिर्फ पूरा बुंदेलखंड जुड़ा बल्कि देशभर में लोग इस अभियान के यज्ञ में आहुति डालने के लिए तत्पर हो गए। अंतत: तीन साल की अथक मेहनत और परिश्रम के बाद यह पवित्र संकल्प पूरा हो सका। २७ अक्टूबर २०१५ को प्रतिमा निर्माण के लिए पूजन हुआ और फिर यह काम शुरू हो गया।
महाराजा छत्रसाल को लेकर बुंदेलखंड में यह बने कीर्तिमान :
२०१४ में छतरपुर में स्थापित हुई यूनिवर्सिटी का नाम महाराजा छत्रसाल पर हुआ
२१ जून २०१५ को छत्रसाल स्मृति शोद्य संस्थान की स्थापना हुई।
२७ अक्टूबर २०१५ को अष्ठधातु प्रतिमा स्थापना के लिए भूमिपूजन हुआ।
२०१६ में महाराजा छत्रसाल के नाम से रेलवे स्टेशन का नामकरण हुआ।
२०१७ में प्रसिद्ध अभिनेता आशुतोष राणा ने महाराजा छत्रसाल पर आधारित डाक्यूमेंटी में शौर्यगाथा का आवाज दी
२०१७ में महाराजा छत्रसाल की जीवनी को शासन ने पाठ्यक्रम में शामिल किया।
२०१६-१७ में महाराजा छत्रसाल के जीवन पर केंद्रित एक दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशति हुईं।
२०१८ में ५२ फिट ऊंची महाराजा छत्रसाल की प्रतिमा का निर्माण पूरा हुआ।
२१ मार्च १८ को आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत करेंगे प्रतिमा का लोकार्पण।
यह है महाराजा छत्रसाल की जीवन यात्रा :
1. ४ मई १६४९ ईसवी को टीकमगढ़ जिले के लिधौरा में मोर पहाड़ी पर महाराजा छत्रसाल का जन्म हुआ
2. 1658 से 1661 ईसवी में तीन साल में पिता के निधन के साथ संकटमय परिस्थिति में अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा
3. 1660 ईसवी में विंध्यवासिनी देवी, पूजन के लिए पुष्प-चयन के समय मुगल सरदार का वध। धर्म-संस्कृति की रक्षा के लिए पहला कदम उठाया।
4. 1662 से 1664 के बीच आर्थिक और सामाजिक सौहार्द का प्रयास।
5. 1665 ईसवी को जनवरी में भाई अंगद और चाचा जामशाह के माध्यम से मिर्जा राजा जयसिंह से मिलना और जयसिंह की सेना में नियुक्ति।
६. १६६५ ईसवी मई में पुरंदर के युद्ध में वीरतापूर्ण प्रदर्शन और जयसिंह की अनुशंसा पर बादशाह की तरफ से मनसब की प्राप्ति।
7. १६६५-६६ ईसवी में बीजापुर आक्रमण में भागीदारी।
८. १६६७ ईसवी में देवगढ़ पर हुए मुगल आक्रमण में अपनी वीरता और साहस से अपनी सेना को विजय दिलाई। मुगलों के अपमान से सेना से अलग हुए।
९. १६६७ ईसवी के अंतिम महीनों में छत्रपति शिवाजी महाराज से भेंट की।
१०. १६७१ से १७२७ तक ५२ युद्ध लड़कर पूरे बुंंदेलखंड में राज्य स्थापित कर विस्तार किया।
11. १६७५ ईसवी में महामति प्राणनाथ से मिलकर पन्ना को राजधानी बनाने का विचार किया, गौड़ राजाओं को हराकर अपना प्रभुत्त स्थापित किया।
12. 1 जनवरी १७०७ ईसवी को मुगल सम्राट औरंगजेब ने राजा का खिताब और चार हजार मनसब से नवाजा।
13. १७०८ ईसवी 2 जुलाई को बहादुरशाह द्वारा राजा की उपाधि, 5 हजार जात एवं 4 हजार का मनसब दिया गया।
14. १७२७ ईसवी में बंगस खां द्वार पुन: आक्रमण, छत्रसाल की अद्भुत राजनैतिक सूझबूझ और बाजीराव की सहायता से युद्ध जीता।
१५. ४ दिसंबर १७३१ ईसवीं को छत्रसाल का महाप्रयाण, एक स्थान पर केवल उनके वस्त्र मिले और वे अंर्तध्यान हो गए।
Published on:
17 Mar 2018 11:00 am
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