8 फ़रवरी 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बरकोंहा, गौरिहार, कुकरेल और महुआझाला के ग्रामीण स्टेडियम वर्षों से अनुपयोगी, खंडहर बने

प्रशासन की लापरवाही और विभागीय खींचतान के कारण खंडहर में बदल रहे हैं। शहर के बीच स्थित बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम में टर्फ बिछने के बाद अब वहाँ सिर्फ फुटबॉल और एथलेटिक्स होते हैं। क्रिकेट के लिए शहर में कोई मैदान नहीं बचा।

2 min read
Google source verification
rular stedium

बरकोंहा स्टेडियम

खेलों के नाम पर बनाए गए सपनों के स्टेडियम आज प्रशासन की लापरवाही और विभागीय खींचतान के कारण खंडहर में बदल रहे हैं। शहर के बीच स्थित बाबूराम चतुर्वेदी स्टेडियम में टर्फ बिछने के बाद अब वहाँ सिर्फ फुटबॉल और एथलेटिक्स होते हैं। क्रिकेट के लिए शहर में कोई मैदान नहीं बचा। ऐसे में उम्मीद थी कि राजनगर रोड पर पलौठा के पास बना स्टेडियम काम आएगा, लेकिन 80 लाख रुपए से तैयार यह मैदान छह साल से ताले में कैद है।

ये है शहर से सटे स्टेडियम के हाल

2018 में संकटमोचन मार्ग पर ग्राम पलौठा के समीप 80 लाख की लागत से तैयार किया गया यह स्टेडियम खिलाडिय़ों के सपनों की उड़ान बनने वाला था। पवेलियन, बाउंड्रीवॉल और मैदान बना, लेकिन किसी ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली। न कोई आयोजन, न कोई रखरखाव। आज यहां मवेशी चरते हैं, रात होते ही असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगता है। पवेलियन की सीढिय़ों से टाइल्स उखड़ चुकी हैं, गैलरी की दीवारें सीलन से भीग रही हैं और मैदान में गड्ढे व सूखी झाडि़यां उग आई हैं।

जिले में पांच स्टेडियम, चार वीरान, सिर्फ एक जीवित

जिले में ग्रामीण विकास विभाग द्वारा पांच स्टेडियम बनाए गए। पलौठा, गौरिहार, कुकरेल और महुआझाला के स्टेडियमों की हालत लगभग एक जैसी है। सब अनुपयोगी, सब पर उपेक्षा की मोटी परत जमी है। केवल बड़ामलहरा विधानसभा के अंतर्गत बना मुंगवारी स्टेडियम ही ऐसा है जिसे चौपरिया सरकार क्रिकेट क्लब ने अपनी मेहनत से जीवित रखा है। क्लब के कप्तान रजक राजा कहते हैं, हम खुद मैदान की देखरेख करते हैं, टूर्नामेंट कराते हैं, लेकिन प्रशासन से कोई मदद नहीं मिलती।

खिलाडिय़ों की बेबसी

छतरपुर के वरिष्ठ क्रिकेटर राहुल पित्रे और संदीप चौरसिया साफ शब्दों में कहते हैं, शहर में क्रिकेट के लिए कोई मैदान नहीं बचा। युवा मेहनत करना चाहते हैं लेकिन मैदान न होने से उनका भविष्य अटक रहा है। जनप्रतिनिधियों को इस दिशा में ध्यान देना चाहिए।

स्थानीय लोगों के अनुसार स्टेडियम का निर्माण जनपद पंचायत ने कराया, रखरखाव ग्राम पंचायत बरकोंहा को करना था और प्रतियोगिताओं की जिम्मेदारी खेल एवं युवा कल्याण विभाग की थी। पर तीनों ने इस पर से हाथ खींच लिया। खेल विभाग के जिला अधिकारी राजेंद्र कोष्टा भी मानते हैं, स्टेडियम का हैंडओवर भोपाल से होना है, जिला स्तर पर हमारे पास अधिकार नहीं है।

नई योजनाएं भी अटकीं

शहर के भीतर मल्टी स्पोट्र्स कॉम्प्लेक्स की योजना पर विचार जरूर चल रहा है, पर जमीन नहीं मिल रही। सवाल यह है कि जब तैयार स्टेडियम की यह दुर्दशा है तो नई योजनाओं का क्या अंजाम होगा? बरकोंहा स्टेडियम की जंग लगी कुंडी और उसकी वीरानी खेल प्रतिभाओं के भविष्य पर ताला लगाकर बैठी है। 80 लाख का यह सपना आज भी धूल और झाड़-झंखाड़ में दबा पड़ा है और हर गुजरते दिन के साथ यह उपेक्षा की जंजीर और मजबूत होती जा रही है।