
Chhatarpur
छतरपुर। कला के क्षेत्र में शहर का दायरा अब व्यापक हो रहा है। हर क्षेत्र में हुनरमंद बनने के लिए शहर के युवाओं में होड़ मची है। वे हर चैलेंज को स्वीकार रहे हैं। चाहे नाट्य की बात हो या गायन-वादन की या फिर मूक अभियन जैसी लुप्त होती कला की बात हो। हर क्षेत्र में युवाओं का दखल तेजी से बढ़ा है। शहर के 15 युवाओं की टोली ने हालही मे 10 दिन का छोटा सा प्रशिक्षण लेकर माइन आर्ट में पैर जमा लिए हंै। प्रशिक्षण के बाद ही तीन बार मंच पर उतरकर वे इस कला से लोगों को अपना मुरीद बना चुके हैं। इस विद्या को संरक्षण देने का का शहर में गांधी स्मारक निधि के माध्यम से किया गया है।
छोटे से शिविर से हुई बड़ी शुरुआत :
शहर के युवा रंगकर्मी शिवेंद्र शर्मा ने बताया कि एक माह पहले उनका संपर्क पश्चिम बंगाल के माडन आर्टिस्ट सुशांत दास से परिचय हुआ था। सुशांत पश्चिम बंगाल की यूनिवर्सिटी से माइन आटर्् में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। गांधी आश्रम की दमयंती पाणी ने उनका परिचय कराया तो मूक अभिनय कला के प्रशिक्षण की बात हुई। आनन-फानन में उन्होंने अपनी टीम के युवाओं से बात की तो 15 लोग तैयार हो गए। 5 से 15 जनवरी तक गांधी आश्रम में ही इस कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमेें शहर की निकिता चतुर्वेदी, विशाल सेन, नरेंद्र सिंह परिहार, भूपेंद्र वर्मा, मानस गुप्ता, नीलमणि बुंदेला, सौरभ सोनी, अंकित गुप्ता, कृष्णकांत मिश्रा, धीरेंद्र अग्रवाल, संजीव श्रीवास, नितिन रैकवार, आकर्ष पांडेय, राज अवस्थी, अभिषेक सेन और मानसी यादव ने सहभागिता की। इन युवाओं ने मूक आर्ट का मेकअप, भाव-भंगिमाएं की बारीकियां सीखीं। इसके बाद वे ऐसे पारंगत हुए कि उन्होंने सीधे मंच पर उतरकर अपने हुनर का जलवा दिखा दिया।
दो सप्ताह में तीन बाद मंच पर उतर चुके हैं कलाकार :
मूक अभिनय कला को सीखने के तुरंत बाद शहर के कलाकारों ने सीधे मंच से आपने आप को जोड़ लिया। इन्होंने सबसे पहले कार्यशाला के समापन पर हुए मंचन में अपनी भागीदारी निभाई। इसके बाद इन्होंने 26 जनवरी को भारत पर्व के मौके पर पर्यावरण बचाने का संदेश देने वाली भावपूर्ण प्रस्तुति की। 30 अक्टूबर को ही गांधी जी की पुण्यतिथि पर शहर के युवाओं की इस टीम ने मूक अभिनय कला के माध्यम से चलित झांकी की प्रस्तुति दी।
इंसान के जन्म के साथ ही हुआ माइन आर्ट् का सृजन :
रंगकर्मी शिवेंद्र शुक्ला का कहना है कि संसार में अभिनय कला की शुरुआत इंसान के जीवन की शुरुआत से ही होती है। बच्चा गर्भ में ही मूक अभिनय शुरू कर देता है। जब तक इंसान बोलता नहीं है, तब तक सब कुछ इशारों से ही संवाद होता है। माना जाता है कि जबसे दुनिया में भाषा आई तभी से इंसानों के बीच दूरियां बढ़ीं। बोली से ही वैमन्यता और कटुता पैदा हुई। ऐसे में मूक अभिनय कला एक बढ़ा संदेश देती हैं कि भाषा और बोली को छोड़कर लोग यदि भावनाओं को समझे तो दुनिया में प्रेम, शांति, सद्भाव और भाईचारा बढ़ेगा।
Published on:
01 Feb 2018 02:43 pm
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