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रकबा बढ़कर 3.80 लाख हेक्टेयर हुआ, पर पंजीयन 26 हजार से घटकर सिर्फ 15 हजार; प्रशासन की सुस्ती या किसानों की बेरुखी?

सरकारी खरीदी में सबसे बड़ी समस्या भुगतान की प्रक्रिया है। पोर्टल की खराबी और बैंक खातों के सत्यापन में देरी के कारण किसानों को अपनी ही फसल का पैसा महीनों बाद मिलता है।

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गेहूं की पैदावार

बुंदेलखंड के सबसे प्रमुख कृषि प्रधान जिले छतरपुर में इस बार गेहूं की पैदावार को लेकर आंकड़ों का एक ऐसा विरोधाभास सामने आया है, जिसने प्रशासन से लेकर विशेषज्ञों तक को चिंता में डाल दिया है। एक तरफ जहां गिरदावरी के आंकड़ों में गेहूं की बोवनी का रकबा ऐतिहासिक ऊंचाई को छू रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी खरीदी के लिए होने वाले पंजीयन की रफ्तार सुस्त पड़ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह सरकारी तंत्र की सुस्ती है या फिर किसानों की बेरुखी?

रकबे में रिकॉर्ड तोड़ उछाल, पंजीयन में ऐतिहासिक गिरावट

राजस्व विभाग के ताजा गिरदावरी आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष छतरपुर जिले में कुल 3.80 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बोवनी की गई है। पिछले साल यह आंकड़ा 3.26 लाख हेक्टेयर था। यानी रकबे में लगभग 54 हजार हेक्टेयर की भारी बढ़ोतरी हुई है। लेकिन इसके विपरीत, पंजीयन का गणित पूरी तरह उल्टा बैठ रहा है। पिछले साल जहां 26 हजार किसानों ने समर्थन मूल्य पर बेचने के लिए पंजीयन कराया था, वहीं इस साल 7 मार्च से महज दो दिन पहले तक यह आंकड़ा 15 हजार पर ही सिमट कर रह गया है। 11 हजार किसानों की यह कमी जिला प्रशासन के दावों की पोल खोल रही है।

क्यों टूट रहा सरकारी सिस्टम से किसानों का मोह?

ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान किसानों ने अपनी बेरुखी के तीन सबसे बड़े कारण गिनाए हैं।

मंडी और समर्थन मूल्य में टक्कर

शासन ने गेहूं का समर्थन मूल्य 2600 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। वहीं, स्थानीय अनाज मंडियों में भी गेहूं लगभग इसी रेट पर बिक रहा है। किसानों का कहना है कि जब खुले बाजार में समान दाम मिल रहे हैं, तो सरकारी केंद्रों पर तुलाई के लिए हफ़्तों इंतजार क्यों करें?

भुगतान का पेच और लेटलतीफी

सरकारी खरीदी में सबसे बड़ी समस्या भुगतान की प्रक्रिया है। पोर्टल की खराबी और बैंक खातों के सत्यापन में देरी के कारण किसानों को अपनी ही फसल का पैसा महीनों बाद मिलता है। इसके विपरीत, मंडी में नकद या 24 घंटे के भीतर भुगतान मिल जाता है।

प्रशासनिक अनिश्चितता: पंजीयन की आखिरी तारीख सिर पर है, लेकिन सरकार ने अभी तक खरीदी शुरू करने की तारीख का ऐलान नहीं किया है। इस वेटिंग गेम से किसान खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।

विशेषज्ञों की चेतावनी: उत्पादन बढ़ेगा, पर क्या बिकेगा?कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इस साल मौसम की मेहरबानी और उन्नत किस्मों के कारण उत्पादन 15-20 प्रतिशत तक अधिक रह सकता है। प्रति हेक्टेयर 50 से 60 क्विंटल की पैदावार होने की पूरी संभावना है। ऐसे में यदि किसान सरकारी केंद्रों पर नहीं पहुंचते हैं, तो मंडियों में भारी आवक के कारण दाम गिरने का खतरा भी पैदा हो सकता है।

जिम्मेदारों का बयान: उम्मीद अभी बाकी है

इस पूरे मामले पर जिला खाद्य अधिकारी सीताराम कोठारे का कहना है कि पंजीयन की तिथि बढ़ने की पूरी संभावना है। उन्होंने अपील की है कि किसान अंतिम समय का इंतजार न करें और पंजीयन कराएं। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया है कि खरीदी की तिथि एक-दो दिन में साफ हो जाएगी।

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