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अनोखा शिवमंदिर जहां नाग राजा करते थे भूतेश्वर महादेव की पूजा

मान्यता छठवीं शताब्दी में नाग राजाओं ने रखी थी मंदिर की नींव  

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हमारी विरासत

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छतरपुर। जिले में विरासत जगह जग बिखरी पड़ी हुई है, जो हमारे इतिहास की समृद्धि की कहानी कह रहे हैं। जिले में ऐसा शिवधाम हैं जो अपनी प्राचीन मान्यताओं एवं आस्थाओं के चलते भक्तों के बीच अलग जगह रखता हैं। सरसेड़ धाम से पहचाना जाने वाला ये मंदिर जिला मुख्यालय छतरपुर से 60 किलोमीटर नौगांव तहसील के अंर्तगत आने वाले हरपालपुर नगर से 3 किलोमीटर दूर स्थित सरसेड़ गांव में पहाड़ी के ऊपर है।

मान्यता हैं कि छठवीं शताब्दी में नागराजों की राजधानी रही इस गांव में बना शिव मंदिर पहाड़ की गोद में बसा हैं। जो पत्थरों को काट कर बनाया गया हैं। विशाल भूतेश्वर महादेव का मंदिर न जाने कितने' रहस्यों को मंदिर अपनी दीवारों में छिपाए है। नाग राजाओं की आस्था विश्वास का प्रतीक अनोखा शिवमंदिर जो कोर्णाक व खजुराहों मंदिरों की तरह विश्व विख्यात भले ही न हो पर मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं कौतुहल और जिज्ञासा केंद्र वर्षों से बना हैं। सरसेड में छठवीं शताब्दी में नागराजाओं की रियासत हुआ करती थी नागराजाओं के काल में जो मंदिर मठ किले बनाये जाते थे उस में पत्थर का उपयोग किया जाता था, चूने का उपयोग नही करते थे ।
शांतिदेव ने कराया निर्माण
सरसेड़ में स्थित भूतेश्वर महादेव का मन्दिर का निर्माण नागराजा शांतिदेव के द्वारा कराए जाने के प्रमाण इतिहास में मिलते हैं। गांव में किंदवंती हैं कि सूखा अकाल पडऩे पर राज्य की जनता त्राहि त्राहि कर उठी तो नागराजा शान्तिदेव ने इस आपने राज्य की जनता को बचाने के लिये शिव उपासना तो शिव जी ने स्वप्न में दर्शन दे कर कहा कि इस पहाड़ पर कही भी खोदो पानी ही पानी होगा जिसका आज भी प्रमाण हैं। मंदिर के पास पहाड़ पर बने पांच जल कुंड भीषण सूखे में भी पूरे वर्ष भर पानी से भरे रहते हैं। इस मंदिर के पास एक गणेश मंदिर जिसके पास से एक गुफ़ा अंदर की ओर जाती हैं जिस रास्ता अब बंद कर दिया गया हैं।

मनोकामना पूर्ण होती हैं
भूतेश्वर महादेव के मंदिर में दूरदराज आने वाले श्रद्धालु शिवलिंग पर जलचढ़ा कर पूजाचर्ना करते हैं। मंदिर में लगे जीर्णाद्धार के बोर्ड एवं सैकड़ो की संख्या में लटकते झूमर मनोकामना पूर्ण होने के गवाह हैं। भतेश्वर महादेव मंदिर की विशेषता हैं कि शिवलिंग के ऊपर विशाल चट्टान हैं जो शेष नाग की तरह शिवलिंग पर फऩ फैलाए हए दिखती हैं। लोगों की मान्यता अनुसार प्रत्येक पांच वर्ष में चट्टान एक इंच ऊपर उठती हैं। वर्षों पहले दर्शन को आने वाले श्रदालु पहले लेट पर शिवलिंग की परिक्रमा किया करते थे। आज के समय श्रद्धालु बैठकर आराम से परिक्रमा कर लेते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के पास पहले एक हनुमानजी हैं तो दूसरी ओर अंजनी माता विराजमान हैं। इसके बाद एक बड़ी पत्थर की शिला पर सूर्यभगवान की प्रतिमा है, जो पत्थर को काट कर उकेरी गई गई है। इस मंदिर में शिल्पकला के रूप शिलालेखों पर चित्रकारी बनाई है साथ मंदिर में गणपति,पार्वती जी ,विष्णु सहित अनेक प्रतिमाएं प्राप्त होती हैं। गर्भगृह के मध्य शिवलिंग हैं। गुफा का द्वार पूर्व की ओर हैं तीन ओर बंद हैं आज भी सूर्य की पहली किरण पड़ती हैं, शरद पूर्णिमा का पूर्ण प्रकाश गुफा अंदर तक उजाला करता हैं। मंदिर के दक्षिण दिशा में स्थित पहाड़ की चोटी पर गोरखनाथ का मंदिर हैं। इतिहासकार डॉ नरेंद्र अरजरिया ने बताया कि नागराजाओं द्वारा पूजा करने पर शिवलिंग के रूप में स्वयंभू प्रकट हुए हैं।