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उद्गम स्थल से 80 किमी का सफर, 25 हजार से अधिक किसानों को मिल रहा फायदा

कुलबेहरा नदी छिंदवाड़ा शहर के लिए आज भी अमृत कुंड के समान ओर कई गांवों के लिए जीवन रेखा है

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Kulbehra nadi

शहर के पास से निकलने वाली कुलबेहरा नदी, भले ही बड़ी नदियों के समान न मानी जाती हो, लेकिन छिंदवाड़ा शहर के लिए आज भी अमृत कुंड के समान एवं जिले के दर्जन भर से अधिक गांवों के लिए जीवन रेखा है। इस नदी से न सिर्फ गांवों के हजारों हेक्टेयर रकबे को सिंचाई के लिए पानी मिलता है, बल्कि छिंदवाड़ा शहर की आधी आबादी की प्यास इस नदी के बिना बुझाई नहीं जा सकती है। नदी का अस्तित्व आज का नहीं वरन कई दशकों पुराना है। इस नदी का आज भी वही महत्व है जो काफी पहले था।

नगर निगम की जलापूर्ति में 26 एमएलडी पानी का योगदान

शहर में 42 हजार से अधिक नल जल कनेक्शन हैं, जिनमें कुलबेहरा नदी का योगदान आधे से अधिक है। माचागोरा डैम के अस्तित्व में आने के पूर्व तक कन्हरगांव डैम से ही शहर की 3 दर्जन से अधिक छोटी बड़ी टंकियां भरती थीं। कुलबेहरा नदी से आज भी भरतादेव में 11 एवं 15.75 एमएलडी के 2 फिल्टर प्लांटों को रॉ वाटर मिलता है। इस पानी की आपूर्ति कुलबेहरा नदी से ही भरने वाले कं हरगांव डैम से होती है। कुलबेहरा नदी से बारिश के मौसम से लेकर दिसंबर तक रॉ-वाटर लगातार सप्लाई किया जाता है। इस सप्लाई के होने तक निगम जून तक सप्लाई को लेकर निश्चिंत रहता है। कुलबेहरा नदी के महत्व को देखे तो 2021 में इस नदी के पानी को रोकने के लिए निगम ने करीब पौने 2 करोड़ खर्च कर एनीकट बनाया। और उसके बनने के बाद नदी से रॉ-वाटर की सप्लाई का समय 3 माह और बढ़ा।

उद्गम से पेंच तक का सफर

कुलबेहरा नदी का उद्गम स्थल जिले के उमरेठ तहसील के पास है, जहां से निकलकर कुंडाली, गांगीवाड़ा, कंहरगांव, रोहना, बांडाबोह, थुनिया भांड, सर्रा, इमलीखेड़ा, शिकारपुर, लिंगा कालीरात, बीसापुर, चांद होते हुए पेंच नदी में जाकर मिलती है। नदी की लंबाई करीब 80 किमी है, नदी की चौड़ाई कहीं पर तो 20 मीटर तो कहीं पर 120 मीटर है। इस नदी के जलस्तर को जिले के अन्य नाले रामदोह, बोदरी, चौहारी आदि बढ़ाते हैं। नदी से जिले के 25 हजार किसानों को उनके खेतों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होता है।

दशकों से है आस्था का केंद्र

कुलबेहरा नदी के बारे में सारसवाड़ा की 80 साल की शारदा बाई माहोरे ने बताया कि जब शहर नहीं बसा था, तब तो यह नदी ही हम सभी के लिए गंगा, यमुना थी। लिंगा के पास कालीरात में नदी के किनारे अंतिम संस्कार क्रिया का अपना ही महत्व था। आज कुछ स्थानों पर पानी का प्रवाह कम है, लेकिन एक समय था, कि नदी का प्रवाह काफी तेज रहता था। कालीरात में आज भी दीपावली के बाद नदी तट पर लगने वाला मेला नदी की प्राचीनता को प्रमाणित करता है। 75 वर्षीय सर्रा निवासी शांताराम बताते हैं कि कुलबेहरा नदी के किनारे के गांवों के कुंओं में कभी पानी की कमी नहीं होती थी, आज इसे उथला किया जा रहा है।

कुलबेहरा नदी, छिंदवाड़ा का जीवन है, इस नदी को अब नुकसान पहुंचाया जा रहा है, इसका सरकार को संरक्षण करना चाहिए। नदी से अवैध रेत खनन करके इसे हानि पहुंचाई जा रही है, वहीं नदी तट के आसपास अतिक्रमण करके इसके दायरे को कम किया जा रहा है।
बबला पटेल, सामाजिक कार्यकर्ता