
क्लिनीकल गाइडलाइन में कहा गया है 10 हजार क्यूबिक एमएम से कम होने पर ही प्लेटलेट्स जरुरी .
प्रभाशंकर गिरी
छिंदवाड़ा। महाकौशल के तीन आदिवासी बहुल जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं में समानता के बावजूद महिला और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर काफी अंतर देखने को मिला है। सिवनी जिले में खून की कमी (एनीमिया) से ग्रस्त बच्चों की संख्या में भारी इजाफा दर्ज किया गया है। वर्ष 2015-16 में जहां 6-59 महीने की उम्र के 60.8 फीसदी बच्चे एनीमिक थे, वहीं 2019-21 में यह प्रतिशत बढकऱ 71.8 तक पहुंच गया। जबकि, छिंदवाड़ा और बालाघाट में काफी कमी आई है।
एनीमिक महिलाओं की बात की जाए तो भी सिवनी जिले का ग्राफ बढ़ा है। 15 से 49 वर्ग की गर्भवती महिलाओं में पांच साल में 7.9 फीसद इजाफा हुआ है, तो वहीं इसी आयु वर्ग की सामान्य महिलाओंं के एनीमिक होने के मामले 4.5 फीसद बढ़े हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएचएफएस-5) के आंकड़े सिवनी जिले के लिए ङ्क्षचता का विषय हैं। जहां छिंदवाड़ा और बालाघाट में काफी सुधार हुआ है । वहीं, सिवनी जिले में बच्चों में खून की कमी कुपोषण की समस्या बढऩे के संकेत हैं। जानकारों की मानें तो मां और शिशु को उपयुक्त पोषक आहार न मिलना इसकी बड़ी वजह है।
इधर छिंदवाड़ा में एनीमिक बच्चों के मामलों में 15.2 फीसद तो बालाघाट में 12.4 फीसद की गिरावट आई है। वहीं 15 से 19 वर्ष की युवतियों के आंकड़ों में भी सुधार हुआ है।
प्रदेश की यह है स्थिति:
एनएचएफएस की रिपोर्ट के अनुसार 2019-21 के दौरान प्रदेश के शहरों में 72.5 और गांवों में 72.7 फीसदी बच्चे खून की कमी से ग्रस्त पाए गए। यानी उनके रक्त में हिमोग्लोबिन की मात्रा 11 ग्राम/प्रति डेसीलीटर से कम मिली। गांव व शहर को मिलाकर यह प्रतिशत 72.7 फीसदी है। एनएचएफएस-4 में कुल 68.9 बच्चे खून की कमी से ग्रस्त थे। इस प्रकार पांच सालों के भीतर एनीमिक बच्चों में तकरीबन 3.8 फीसदी मामले बढ़े हैं। वहीं 15 से 49 आयु वर्ग की सभी महिलाओं में 2.2 फीसद का इजाफा हुआ है। इसी आयु वर्ग के पुरुषों में 3.1 फीसद की गिरावट आई है।
कोरोनाकाल में प्रभावित रही मुहिम
शासन की ओर से एनीमिया के मामलों में सुधार के लिए विभिन्न अभियान चलाए जाते हैं। आंगनबाड़ी से लेकर प्रमुख अस्पतालों तक दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के दौरान दो वर्ष के कोरोनाकाल में सम्भवत: स्वास्थ्य विभाग की मुहिम प्रभावित हुई है। यह भी एनीमिया के मामलों में इजाफा की बड़ी वजह है।
इनका कहना है
दस्तक अभियान के तहत जबलपुर सम्भाग के सभी जिलों में घर-घर सर्वे करके मरीजों को चिह्नित किया जा रहा है। मरीजों को दो श्रेणियों में रखा गया है, जिनमें 11 से 7 ग्राम हीमोग्लोबिन जिनका मिल रहा है, उन्हें मार्डरेड श्रेणी में रखा गया है। ऐसे मरीजों को रक्त बढ़ाने आवश्यक दवाएं दी जा रही हैं। इनमें गर्भवती महिला यदि है, तो ब्लड भी चढ़ाया जा रहा है। सात ग्राम से कम जिनका हीमोग्लोबिन आ रहा है उन्हें सीवियर एनीमिया की श्रेणी में रखा जा रहा है और उन्हें अस्पताल में भर्ती करके ब्लड चढ़ाया जा रहा है। आदिवासी अंचल में जो एनीमिया के मामले सामने आ रहे हैं उसके पीछे मुख्य कारण यह है कि घर-घर जाकर जांच की जा रही है। एनीमिया के प्रति जागरूकता अभियान भी निरंतर चलाया जा रहा है।
डॉ. संजय मिश्रा क्षेत्रीय संयुक्त संचालक स्वास्थ्य सेवाएं
Published on:
22 Sept 2022 11:07 am
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