छिंदवाड़ा. इस संसार और जीवन के मोह से छूटना है तो विरक्त होकर ही इसे पाया जा सकता है। हम जीवन भर कर्म करते रहते हैं। जीवन रूपी गाड़ी को हम संसार भ्रमण में लगाए रखते हैं यही तो हमारे मुक्ति मार्ग में बाधक बनता है। यह बात मुनि सुप्रभ सागर ने कही।
गुलाबरा के ऋषभ नगर में अपने प्रवचनों की श्रृंखला में उन्होंने कहा कि विषय भोगों से विरक्ति में ही सुख है। सबके साथ रहकर भी उनके साथ न होना यह पुरुषार्थ संसार के और उससे छूटने का पुरुषार्थ है। हम इंद्रियों में आसक्त रहते हैं और उसे ही सच्चा सुख और खुशी मानते हैं जबकि एेसा नहीं है।
यह संसार में बने रहेने और हमारे दुख का कारण बनता है। इससे देर होना है तो हमें विरक्त होना पड़ेगा तभी संसार हमसे छूट पाएगा। जब तक इससे जुड़े रहेंगे इसे पकड़े रहेंगे तब तक स्वयं को कोई कल्याण नहीं होने वाला। हमें विषयों से अलिप्त रहने की कला सीखना होगी तभी विरक्ती का मार्ग हम प्रशस्त कर सकेंगे।