जिम्मेदारों की मनमानी से शैक्षणिक व्यवस्था बेपटरी। आकस्मिक निरीक्षण में सामने आ रही हैं कमियां
शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रदेश में किए जा रहे कुछ नवाचारों के बावजूद सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर संतोषजनक नहीं है। चिंताजनक है, यह कहना बेहतर होगा। प्रदेशभर में सीएम राइज स्कूल खोले जा रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि इनमें निजी स्कूलों से बेहतर सुविधाएं और शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएंगी, लेकिन वर्तमान सरकारी स्कूलों की स्थिति देखकर इसका विश्वास करना मुश्किल हो रहा है। कई स्थानों पर सीएम राइज स्कूल तक अव्यवस्था के शिकार नजर आते हैं। शासकीय स्कूलों की तो बात ही और है। इनमें करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद शैक्षणिक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। शिक्षा का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।
शैक्षणिक सामग्री, गणवेश, साइकिल, भोजन समेत सभी प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराने के बावजूद यह स्थिति है, तो व्यवस्था के साथ शिक्षक भी जिम्मेदार हैं, जो पूरी जिम्मेदारीपूर्वक कत्र्तव्य निर्वहन नहीं कर रहे हैं। इस कारण पालक निजी स्कूलों को प्राथमिकता देते आ रहे हैं। शहरों में केवल वे पालक सरकारी स्कूलों की शरण ले रहे हैं, जो निजी स्कूलों की भारी-भरकम फीस का बोझ नहीं उठा पाते। ग्रामीण क्षेत्रों में निजी का विकल्प न या कम होने के कारण बच्चों के लिए पढऩे का एक मात्र स्थान सरकारी स्कूल ही हैं, लेकिन यहां की शिक्षा मासूमों के सपनों को रौंद रही है। छिंदवाड़ा जिले के सौंसर विकासखंड के ग्राम सिंगपुर की शासकीय प्राथमिक शाला में आकस्मिक निरीक्षण में शाला ही दिनभर बंद पाई गई। शिक्षक नदारद मिले।
बालाघाट जिले के वारासिवनी विकासखंड की शासकीय प्राथमिक शाला गोंडीटोला में भी शिक्षक नहीं मिले। परसवाड़ा विकासखंड की एकीकृत शासकीय माध्यमिक शाला कोरजा में एकमात्र पदस्थ शिक्षक अगस्त माह से अनुपस्थित पाए गए। सिवनी जिले के धनोरा विकासखंड की उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कुराड़ी का एक शिक्षक बिना अवकाश के अनुपस्थित एवं अन्य शिक्षक स्टाफ रूम में बैठे पाए गए। प्रदेशभर से ऐसी ही तस्वीरें सामने आ रही हैं। इन स्थितियों को सुधार कर ही शासकीय स्कूलों की दशा को कुछ बेहतर किया जा सकता है। इसके लिए सरकार को व्यवस्था व योजनाओं की समीक्षा करनी होगी। वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करनी होगी, नहीं तो शिक्षा का स्तर और नीचे चला जाएगा।