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आस्था एवं आर्थिक व्यवस्थाओं का समागम है श्रीगणेश उत्सव

27 अगस्त से होगी शुरुआत, 200 से अधिक मूर्तिकार, प्रतिमा बनाने दिन-रात जुटे

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गणेश उत्सव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। शहरभर में 10 दिवसीय इस उत्सव को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। खास तौर पर शहर के कुम्हार समाज एवं मूर्ति व्यवसाय से जुड़े मूर्तिकार इस साल 27 अगस्त से शुरू होने वाले इस त्योहार को लेकर काफी उत्साहित हैं। वे अब श्रीगणेश की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में लगे हुए हैं। एक माह से भी कम समय होने के कारण मूर्तिकारों के परिवार भी इसी काम में अपना सहयोग दे रहे हैं। गणेश उत्सव सिर्फ आस्था ही नहीं, वरन आर्थिक व्यवस्थाओं का केंद्र भी बन जाता है। इस समय मानसून शबाब पर होता है। शादी विवाह पर चार माह की रोक होती है। लगभग समस्त कारोबार ठंडे रहते हैं, तब इस समय श्रीगणेश उत्सव का आगमन मूर्तिकारों सहित हजारों लोगों की आजीविका का साधन बन जाता है।

मूर्ति बनाने में लगने वाला समय एवं लागत

मूर्ति बनाने की तैयारी करीब 5-6 माह से पूर्व से होने लगती है। अप्रेल-मई की गर्मी में मूर्तिकार दमुआ एवं जामई के किसानों के खेत पहुंचते हैं। सबसे पहले मूर्तियों की संख्या के अनुमान लगाते हुए खेत की विशेष मिट्टी लेकर अपने घर या मूर्ति निर्माण स्थल तक लाते हैं, उससे कंकड़ आदि साफ करते हंै। मूर्ति बनानें योग्य शुद्ध करते हैं। बड़ी मूर्तियों का निर्माण उसी दौरान शुरू हो जाता है, जबकि छोटी मूर्तियों को मानसून आते ही बनाना शुरू कर दिया जाता है। सांचों में पूरी आकृति देने के बाद अंतिम स्वरूप हाथों एवं ब्रशों से दिया जाता है। मिट्टी के अलावा, लकड़ी के पटरे,सभी रंग, कपड़े, ज्वेलरी, आदि का खर्च मूर्ति के आकार के साथ 100 रुपए से लेकर 10 हजार रुपए से अधिक हो जाता है। कई प्रोफेशनल मूर्तिकार एक बड़ा स्थान किराए से लेकर आधे साल इसी काम में जुटे रहते हैं। हर साल 1000 से अधिक मूर्ति बनाने वाले मूर्तिकार नितेश प्रजापति बताते हैं कि एक पांच किलो की रंग की बाल्टी भी 10 हजार रुपए तक की आती है। वहीं बिजली का बिल भी 15 से 20 हजार रुपए तक आ जाता है।

मूर्ति की आमदनी से पूरे साल का गुजारा नहीं

मूर्ति कला को जीवित रखने वाले कुम्हार समाज के संगठन के अध्यक्ष शीतल प्रजापति बताते हैं कि कुम्हार समाज की मुख्य आजीविका का आधार आज भी मिट्टी है। पर सिर्फ मूर्ति की ही आमदनी से पूरे साल गुजारा नहीं। कई अब अपने पैतृक कार्य को छोडकऱ दूसरे व्यवसाय एवं नौकरी की ओर जा रहे हैं। हालांकि यह कला उनके अंदर भी है। खुद शीतल बीमा सेक्टर में होने के बावजूद अपने परिवार सहित यह दो माह मूर्ति बनाने में बिताते हैं। उनका कहना है कि कुम्हार समाज के एक सैकड़ा से अधिक परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस कार्य को अपनाए हुए हैं।

उत्सव पर निर्भर करोड़ों का व्यापार

गणेश उत्सव पर सिर्फ मूर्तिकार ही नहीं वरन करोड़ों का व्यापार निर्भर है। गणेश उत्सव से जुड़ी झांकियों के लिए सजावट, बिजली झालर, थर्माकोल, फोम, लकड़ी पटरे, फूल, फल, किराना-अनाज, टेंट हाउस, डीजे, बड़े वाहन, बैंड बाजा पार्टी, कपड़े, आदि से जुड़े व्यापार चल जाते हैं। जिलेभर में मूर्तियों एवं अन्य सामग्री से कम से कम 50 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार चल निकलता है।