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Agriculture:जिले में कम हो रहा है छोटे अनाज का रकबा

इस बार खरीफ सीजन में हो सकता है विस्तार

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farmers facing difficulties due to agriculture department vacant posts

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छिंदवाड़ा. ग्रामीण आदिवासी बेल्ट में उथली जमीन पर ली जानेवाली कोदो कुटकी और इससे संबंधित अन्य अनाजों का उत्पादन जिले में लगातार कम हो रहा है। जिले का हर्रई, अमरवाड़ा, तामिया कोदो कुटकी जैसे छोटे अनाज के लिए जाने जाते हैं लेकिन इन क्षेत्रों में अनाज का रकबा घट रहा है। 2018 में कोदो कुटकी का रकबा 20 हजार 500 हैक्टेयर था जो 2019 में घटकर 14 हजार 800 हैक्टेयर पर आ गया। इसी तरह ज्वार का रकबा 2018 में 7900 हैक्टेयर था जो 2019 में 7100 हैक्टेयर पर आ गया।। दरसल इन अनाजों के उत्पादन के लिए सरकार की तरफ से अन्य अनाजों की तरह कोई योजना नहीं मूर्त रूप ले पाई है। ग्रामीण और असिंचित भूमि और लघु कृषक इन अनाजों को लेते हैं। ज्यादातर के पास तो इन्हें लगाने के लिए लागत का जुगाड़ भी नहीं कर पाते हैं। पिछले साल सूखे के कारण सिंचाई की हालत जिले में बेहद खस्ता थी। यही कारण है इन छोटे अनाज के रकबे पर असर पड़ा है। कृषि विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि सरकार की तरफ से यदि इन अनाजों को लेकर बीज की व्यवस्था के लिए कोई योजना बनती है तो परंपरागत क्षेत्रों के अलावा दूसरे किसान भी इन फसलों को लेने के लिए आगे आ सकते हैं।
प्रदेश के कुल उत्पादन के मुकाबले भी जिला पीछे
छोटे अनाज का प्रदेश में कुल उत्पादन को भी देखें तो जिले में इन फसलों का उत्पादन उल्लेखनीय नहीं हैं। ज्वार-बाजरा की बात करें तो प्रदेश के मालवा और निमाड़ क्षेत्र में इनका उत्पादन ज्यादा होता है। ग्रामीण और आदिवासी अंचलों के साथ अब तो शहरी क्षेत्र के किसान भी इस फसल को मुख्यता से ले रहे हैं। प्रदेश में ज्वार को कुल रकबा 2 लाख 5 हजार हैक्टेयर है। छिंदवाड़ा में इसका रकबा सिर्फ 9 हजार 600 हैक्टेयर है यानि कुल उत्पादन का 5 प्रतिशत से भी कम। इसी तरह बाजरा प्रदेश में 2 लाख 67 हजार हैक्टेयर में ली जाती है। छिंदवाड़ा में बाजरा का रकबा सिर्फ 600 हैक्टेयर यानि प्रदेश के मुकाबले 1 प्रतिशत से भी कम। रागी प्रदेश में 1 लाख 30 हैक्टेयर में पैदा की जाती है। जिले में इसका उत्पादन भी प्रदेश के मुकाबले 2 प्रतिशत से कम क्षेत्र में होता है। कोदो कुटकी जिले में 14 हजार हैक्टेयर में बोई जा रही है सालों से इसका उत्पादन किया जा रहा है लेकिन प्रदेश के कुल उत्पादन का बमुश्किल दस प्रतिशत ही यहां लिया जाता है।