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वजूद और अस्मिता के लिए एक और संग्राम का हुआ मंचन

सत्य घटना को नाटक का रूप देकर इस विषय को युवा रंगकर्मियों ने फिर इस विषय को रखा कई सवालों के साथ

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Mantosh Kumar Singh

Mar 28, 2016

chhindwara

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छिंदवाड़ा. सभ्यता और शालीनता का जामा ओढ़े हमारे समाज में स्त्रियों के प्रति सोच क्या है यह किसी से छिपी नहीं है। तमाम कानूनों, दलीलों और जागरुकता के नारों के बीच आज भी वह शोषित है। वह जूझना चाहती है लडऩा चाहिए और अपने हक, वजूद और सबसे ज्यादा अपनी अस्मिता के लिए। विश्व रंगमंच दिवस पर नाट्य संस्था ओम मंच पर अस्तित्व ने एक और संग्राम नाटक की प्रस्तुति दी। बैतूल में कुछ वर्षों पहले हुई सत्य घटना को कहानी और फिर नाटक का रूप देकर इस विषय को शहर के युवा रंगकर्मियों ने फिर कला और नाट्यप्रेमियों के सामने इस विषय को रखा कई सवालों के साथ।

गांव में रहने वाली समोती बीमार पति और सास की सेवा करने के लिए ठाकुर के यहां काम करती है लेकिन अय्याश ठाकुर उसकी अस्मिता से खेलता है। परम्परागत सोच के बनाए नियमों में उसे अपने सतीत्व की परीक्षा देना पड़ती है। वर्तमान में भी हालात कोई बेहतर नहीं दिखाई देते। पिछले दिनों में ऐसे ही कुछ घटनाक्रम सामने आए हैं। परिवार, समाज का महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु कही जाने वाली स्त्री अपनों से ही जूझने को मजबूर है।

ऐसे में क्या एक और संग्राम की जरूरत नहीं है। समोती कई प्रश्न अपने सामने छोड़ती है शासकों को भी और शोषित होने वालों को भी। बेहद अहम और प्रासंगिक प्रश्न को उठाते हुए युवा निर्देशक शिरीन आनंद दुबे अपने हम उम्र साथियों के साथ मंच पर अपनी उपस्थिति देते नजर आए। यह भी उल्लेखनीय है कि यह कहानी वरिष्ठ रंगकर्मी विजय आनंद दुबे ने लिखी है और शिरीन अपनी टीम के साथ रविवार को इस नाटक की 15वीं प्रस्तुति दे रहे थे। कथानक को प्रस्तुति में पिरोने के पीछे सिर्फ स्वांत: सुखाय या मनोरंजन मात्र उद्देश्य नहीं होता दर्शकों और समाज को एक संदेश देना भी उसका उद्देश्य होना चाहिए।

विश्वरंगमंच दिवस पर इस आयोजन मेें दर्शकों की प्रतीक्षा हमेशा की तरह शिद्दत से महसूस की गई और नियत समय से करीब एक घंटा देर से मंचन का एक कारण यह भी रहा। बहरहाल जो दर्शक थे उन्हें यह प्रस्तुति अच्छी लगी और उभरते, संभावनाशील कलाकारों का अभिनय भी। कई दृश्यों में बजी उनकी तालियां इस बात की गवाही भी देती रही।

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