
छिंदवाड़ा.जिले के 39 फीसदी एरिया में बिखरे जंगल न केवल शुद्ध आबोहवा दे रहे हैं बल्कि दो तिहाई आबादी को महुआ, चिरौंजी समेत 52 प्रजाति की लघु वनोपज और जड़ी-बूटियों से रोजी-रोटी भी दे रहे हैं। ये जंगल पेंच नेशनल पार्क और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के बीच बाघ समेत अन्य वन्य प्राणियों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए वरदान है। विश्व वानिकी दिवस 21 मार्च को इस वन संपदा के लिए हर जिलेवासी को प्रकृति का न केवल आभार मानना चाहिए बल्कि इसके संरक्षण और संवर्धन का संकल्प भी लेना चाहिए।
इस बार इस दिवस की थीम हैं-वन और टिकाऊ उत्पाद और खपत। पहले यह भी बताते चलें कि फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में पिछले तीन साल के दौरान छिंदवाड़ा का जंगल का एरिया 20.12 वर्ग किमी बढ़ गया है। पहले जिले में कुल 11815 वर्ग किमी क्षेत्र में तीन साल पहले 2019 मेें 29.73 प्रतिशत हिस्से में जंगल था। अब फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के नए सर्वेक्षण में वन क्षेत्र 39 प्रतिशत हो गया है। फिर जंगलों के उत्पाद पर चर्चा की जाए तो महुआ, चिरौंजी समेत अन्य लघु वनोपज लाखों वनवासियों को रोजी-रोटी दे रही है।
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जिले में ये वनोपज और जड़ी-बूटियों का भंडार
जिले में 53 वानिकी प्रजातियां सूचीबद्ध हैं। सहज रूप से उपलब्ध प्रजातियों में महुआ, तेन्दू, आचार, चिरोटा/चिरायता, कालमेघ,आम, वन तुलसी,बहेड़ा, जामुन, अर्जुन और बीजा है। खतरे में आई प्रजातियों में आंवला, कुल्लू, सतावर, बेल,भू-आंवला, वन प्याज, सलई, काली मूसली, वन हल्दी और नागर मोथा है। शेष 33 प्रजातियों में गिलोय, अनन्तमूल, कडुजीरा, कल्ला/ सुवारूख, कुसुम, के वकन्द, खैर, गुंजा, गुड़मार, गोखर, चिरोंजी, जंगली अदरक, जंगली कोसा, जंगली रसून, दुधी, धावड़ा, निर्गुन्डी, पारिजात / हर सिंगार, पिस्तापनी, बजरंग बूटी, बायविरंग, मरोडफ़ली, माहुलमेनर, मैदा, मालकंगनी, रतनजोत,रोहन, सफेद मूसली, सर्पगंधा, साजा,सीताफल एवं हल्दू है। ये वन प्रजातियां जड़ी-बूटियां के उपयोग आती है तो वहीं आम जनजीवन के आहार का हिस्सा भी है। इनकी खपत देश-विदेश में होती रही है।
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इनका कहना है..
जिले की वनसंपदा प्राकृतिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं बल्कि लाखों आदिवासियों को रोजी-रोटी देती हैं। इसके प्रति वन अधिकारियों के साथ हर आम नागरिकों को संवेदनशील होना चाहिए। तभी हम इसे सुरक्षित और संरक्षित रख पाएंगे।
-रविन्द्र सिंह, वृक्षमित्र एवं समाजसेवी।
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वनों के प्रबंधन के लिए अब सामुदायिक वन प्रबंधन समितियों का गठन का प्रस्ताव किया गया है। इन्हें वन्य प्राणी, सघन वन, बिगड़े वन में जनभागीदारी सुनिश्चित होगी। समितियों को वनोपज आय की राशि का 20 प्रतिशत हिस्सा दिया जाएगा।
-ईश्वर जरांडे, डीएफओ पश्चिम वन मण्डल।
Published on:
21 Mar 2022 06:08 am
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