
चित्रकूट. देश की कई कुप्रथाओं में से एक है बाल विवाह, आज की 21वीं सदी में भी देश के न जाने ऐसे कितने पिछड़े और ग्रामीण इलाके हैं जहां रूढ़िवादिता के चलते बाल विवाह की कुप्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई। बुन्देलखण्ड भी इस बीमारी से अछूता नहीं रहा या यूं कहें कि अछूता नहीं है। आज भी बुन्देलखण्ड में बाल विवाह की परम्परा ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में कायम है अलबत्ता यह दीगर बात है कि जानकारी नहीं हो पाती बाल विवाह के आयोजनों की। सदियों पुरानी इस रूढ़िवादी परंपरा के पीछे बेटियों को बोझ के रूप में देखे जाने की बात कही जाती है तो वो आज भी जागरूकता के अभाव में कई इलाकों में कायम है। बाल विवाह के इसी दंश के प्रति समाज को जागरूक करने की मुहीम छेड़ी है एक स्वयंसेवी संस्था ने।
गांव गांव जाकर ग्रामीणों को बाल विवाह जैसी कुप्रथा के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें इसके कानूनन व सामाजिक तथा शारीरिक नुकसान के बारे में अवगत कराया जा रहा है। खास बात यह कि कई इलाकों में तय की गई ऐसी शादियों की जानकारियां मिली संस्था को जिसमें लड़की के नाबालिग होने का अंदेशा पाया गया। मौके पर पहुंचते हुए सम्बंधित लड़कियों के पिता को जब इस बारे में अवगत कराते हुए जागरूक किया गया तो उन्होंने पुनः शादी के बारे में विचार करने की बात कही।
बाल विवाह के प्रति अभी भी देश में एक बड़े स्तर पर जागरूकता की आवशयकता महसूस की जा रही है। बुन्देलखण्ड जैसे अति पिछड़े इलाके में इस परम्परा ने आज भी अपने पैर पसार रखे हैं। चित्रकूट में इस रूढ़िवादी परम्परा के प्रति लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से स्वयंसेवी संस्था महिला सामाख्या एवम् महिला एवम् बाल अधिकार मंच ने एक मुहीम शुरू की है जिसके तहत जनपद के अति पिछड़े इलाकों में जाकर ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है।
कायम है कुप्रथा
बाल विवाह की कुप्रथा आज भी कायम है इसकी बानगी देखने को मिली उस समय जब संस्था के लोग मऊ ब्लाक के पूरब पटाई गांव पहुंचे जहां दो लड़कियों की शादी तय होने की सूचना पर उनके नाबालिग होने की जानकारी मिली। सम्बंधित लड़कियों के पिता को जब इस कुप्रथा के बारे में अवगत कराया गया तो उन्होंने कहा कि अब वे दोबारा अपनी बेटियों की शादी के बारे में सोचेंगे और स्कूल से मार्कशीट निकलवाकर यदि उसमें वह 18 वर्ष की हैं तभी उनके हांथ पीले करेंगे। मुहीम में जुटी संस्था की ऊषा शुक्ला ने बताया कि कई ग्रामीण व आदिवासी इलाकों में बाल विवाह की जानकारी मिलती है जिसपर उसे रोकने का प्रयास किया जाता है और अब एक बड़े स्तर पर अभियान चलाकर समाज को जागरूक किया जाएगा। जनपद में बाल विवाह का आंकड़ा 45 प्रतिशत है।
लाभ के चक्कर में कागजों में खेल
जानकारी के मुताबिक लड़कियों के लिए चलाई जा रही विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए परिजनों द्वारा उनकी उम्र में हेर फेर करवा दिया जाता है और ऐसे मामले अति पिछड़े ग्रामीण व् आदिवासी इलाकों मदिन ज्यादा सामने आते हैं।संस्था को अभी तक मऊ ब्लाक में 5 बाल विवाह की जानकारी मिली है जिसे रोकने के लिए उनके परिजनों से संपर्क का प्रयास किया जा रहा है।
Published on:
20 Apr 2018 06:01 pm
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