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Chitrakoot News: चित्रकूट की इस जगह में मिले, महात्मा बुद्ध से जुड़ा अतिपवित्र वोटिव स्तूप,अब……

चित्रकूट में भगवान राम की कर्मस्थली चित्रकूट में वाल्मीकि आश्रम लालापुर से कुछ ही दूरी पर CACH ( चित्रकूट ए कल्चरल हेरिटेज ) की टीम को प्राचीन बौद्ध बिहार के अवशेष मिले हैं ।

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Chitrakoot News: चित्रकूट की इस जगह में मिले, महात्मा बुद्ध से जुड़ा अतिपवित्र वोटिव स्तूप,अब......

Chitrakoot News: चित्रकूट की इस जगह में मिले, महात्मा बुद्ध से जुड़ा अतिपवित्र वोटिव स्तूप,अब......

जिसमें पूर्व मध्यकालीन स्थापत्य कला के अधिक अवशेष प्राप्त हुए हैं । जिसमें मुख्य रूप से तक़रीबन एक मीटर ऊँचाई का पिरामिड आकार का वोटिंव स्तूप प्राप्त हुआ है । यह वोटिव स्तूप लाल बलुआ पत्थर का बना गया है। जिसमें 156 ध्यान मुद्रा की बौद्ध प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं। और आधार पर दो - दो सिंह चारों दिशाओं में बने हैं । वोटिव स्तूप का आधार सपाट है और शिखर शंक्वाकार प्रतीत है। प्राप्त वोटिव स्तूप का ऊपरी भाग टूटे होने के कारण मौजूद नहीं।

उक्त स्थान पर महात्मा बुद्ध से जुड़ी कई खंडित प्रतिमाएँ भी मिलीं और बात की भी आशंका है। अगर उत्खनन हो तो और भी अधिक जानकारियाँ सामने आ सकती हैं। जो समूचे भारतीय इतिहास से गुम हुए बौद्ध संस्कृति एवं स्थापत्य कला के क्षेत्र बड़ी उपलब्धि साबित होगी। यह स्थल उत्तर प्रदेश के कौशांबी जनपद व मध्य प्रदेश के सतना जनपद में स्थित भरहूत स्तूप के समकालीन प्रतीत होता है।

चित्रकूट ए कल्चरल हेरिटेज़ के सदस्य नीरज मिश्र द्वारा अपने खेतों से कुछ ही दूरी पर स्थित इस स्थल की जानकारी इकट्ठा की गई। जिसके बाद चित्रकूट ए कल्चरल हेरिटेज (CACH) के संस्थापक अनुज हनुमत और इविवि के इतिहास विभाग के छात्र गुरु मिश्र एवं CACH के सदस्य पंकज तिवारी की अगुवाई में टीम ने मौक़े पर पहुँचकर स्थल का सघन निरीक्षण और वोटिव स्तूप का अवलोकन किया ।

वोटिव स्तूप का अगर महत्व जानना है तो हमें महाबोधि मंदिर के बारे में जानना होगा । हमें समूचे विश्व के बौद्ध समुदाय के लिए जिस प्रकार विश्वदाय धरोहर महाबोधि मंदिर प्रमुख आकर्षण व आस्था का केंद्र है। मंदिर परिसर में आगत बौद्ध श्रद्धालु कण-कण में अपनी श्रद्धा निवेदित करते हैं। पवित्र बोधिवृक्ष से लेकर मंदिर परिसर में बने दर्जनों वोटिव स्तूप भी उनके लिए विशेष पूजनीय है। मंदिर परिसर में शुंग से पाल काल तक के वोटिव स्तूप हैं। इन स्तूप को संकल्पित स्तूप भी कहा जाता है, जिसे श्रद्धालुओं द्वारा मनोकामनाएं पूरी होने पर लगाया गया है।

क्या होता है वोटिव स्तूप

वोटिव स्तूप मन्नत का चढ़ावा होता है। इसे संकल्पित स्तूप भी कहते हैं। इसमें किसी प्रकार की वस्तु या धातु अवशेष नहीं रखा जाता। किसी की मन्नत पूरी होने पर या इच्छित वस्तु मिलने पर उपासक बड़े स्तूप के चारों ओर इसे बनवाते थे।

इस खोज को लेकर चित्रकूट ए कल्चरल हेरिटेज (CACH) के संस्थापक अनुज हनुमत ने बताया की यह चित्रकूट जनपद सहित समूचे बुन्देलखण्ड के लिए एक बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि साबित होगी। प्रभु श्रीराम की कर्मस्थली में गौतम बुद्ध से जुड़े साक्ष्य मिलना कहीं न कहीं चित्रकूट को विश्वपटल पर प्रदर्शित करने का एक महत्वपूर्ण मौका है। टीम द्वारा खोजे गए वोटिव स्तूप अतिदुर्लभ व ऐतिहासिक महत्व का है।

इन्हें सामान्यतः मनोकामना स्तूप के रूप में देखा जाता रहा है। इस स्थल के आसपास अन्य कई महत्वपूर्ण रहस्य दफ्न हैं। जिनका खुलासा होना आवश्यक है। विद्वान इतिहासकारों के सहयोग व परामर्श व हमारी टीम द्वारा निरन्तर इन छिपे प्राचीन स्थलों को वैश्विक पटल तक पहुँचाने का प्रयास जारी है। यह स्थल मानव बस्ती से दूर एक निर्जन क्षेत्र में एक बड़े बौद्ध विहार के रूप में दिखाई पड़ता है।

टीम द्वारा चलाई जा रही मुहिम ''चित्रकूट जनपद के प्राचीन पौराणिक स्थलों की खोज'' में यह स्थल मील का पत्थर साबित होगा।

इविवि में इतिहास विषय के परास्नातक छात्र जुगेंद्र मिश्रा ने बताया कि यहाँ से प्राप्त वोटिव स्तूप बौद्ध ग्रंथों व मान्यताओं के अनुसार काफ़ी पवित्र माना गया है। साथ ही यहां से प्राप्त अन्य शिलाखण्ड पूर्व मध्यकालीन स्थापत्यकला को दर्शाते हैं। यहां से प्राप्त होने वाली लाल पकी ईंटे प्राचीन बौद्ध स्तूप के पक्के प्रमाण हैं। इस स्थल का सीधा सम्बन्ध कौशाम्बी जनपद तथा मध्यप्रदेश के सतना जनपद में मिले भरहुत बौद्ध स्थल से भी हो सकता है। चित्रकूट में इस बौद्ध विहार का मिलना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है।

ऐसे वोटिव स्तूप अतिदुर्लभ श्रेणी में आते हैं। यहाँ से प्राप्त भग्नावशेषों में हिन्दू तथा बौद्ध स्थापत्यकला के संयुक्त साक्ष्य विद्यमान हैं।इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास के वरिष्ठ प्रोफ़ेसर और प्रसिद्ध इतिहासकार देवी प्रसाद दुबे ने बताया कि ये 10-11वीं शती के वास्तु खण्ड हैं। उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट है कि यहां कोई बौद्ध विहार था।

जहां ध्यानी बुद्ध की चौमुखी स्थापित थी जिसके प्रत्येक ओर 39 ध्यान मुद्रा में कमलासन में आसनस्थ मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। उ प्र और मप्र में आस्तृत बुंदेलखंड में यह एकमात्र महत्वपूर्ण है। 50 वर्षों से पूर्व कीरत सागर महोबा में 3 अभिलिखित बुद्ध प्रतिमायें मिली थीं और 6 वर्षों पूर्व एक बुद्ध मूर्ति पन्ना जनपद मे मिली थी।

ये मूर्तियां पूर्व मध्य काल की हैं. बुंदेलखंड में यही बौद्ध प्रमाण अब तक प्राप्त हैं। चित्रकूट मे तो शैव वैष्णव शाक्त पंथों का प्राधान्य है. जैन मूर्तियां मडफा रामनगर से मिली हैं, चंदेल काल से जैन धर्म बुंदेलखंड में फूला फला और अनेक जैन मंदिर व मूर्तियां प्राप्त हैं। बौद्ध पुरा सामग्री बुंदेलखंड में अत्यल्प है। इसमें चित्रकूट से प्राप्त यह प्रमाण विशेष महत्व का है। यह विहार वज्रयान सहजयान तांत्रिक बौद्धों का केंद्र था।

बुंदेलखंड में तांत्रिक बौद्धों की उपस्थिति का उल्लेख कीर्ति वर्मा चंदेल कालीन कृष्ण मिश्र की प्रबोध चन्द्रोदय में मिलता है किन्तु पुरावशेष मात्र चित्रकूट से अब प्रकाश में आया है. शासन को इसे यथा शीघ्र संरक्षित किया जाये ताकि इन पुरावशेषों का गहन अध्ययन किया जा सके और पर्यटन को बढावा मिल सके। चित्रकूट जनपद तो पुरावशेषों की खान है. आवश्यकता मात्र इनके संरक्षण और प्रकाश में लाने की आवश्यकता है।