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जज़्बे को सलाम: बेटी को पढ़ाने के लिए एक पिता का संघर्ष, मदद की दरकार

दिब्यांग बेटी को अपने कंधों पर बैठाकर ले जाते हैं स्कूल।  

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Salute to - Father struggle

जज़्बे को सलाम: बेटी को पढ़ाने के लिए एक पिता का संघर्ष, मदद की दरकार

चित्रकूट. ये तस्वीर उन लोगों के लिए नजीर हो सकती है जो बेटियों को दहलीजों में बांधकर रखने और उन्हें समाज की दकियानूसी सोच के कोड़े से मारते हुए आज की 21वीं सदी में भी उनके सपनों के पंखों को कतरने में भरसक प्रयासरत हैं। ये वे लोग हैं जो समाज से लेकर घर परिवार तक बेटियों को रूढि़वादी संस्कृति का हवाला देकर खुद में मर्यादा पुरषोत्तम बनने का कथित ख्वाब रखते हैं। एक ऐसी ही तस्वीर सामने आई चित्रकूट में जहां एक बेटी और उसके पिता के जज़्बे को आज हर कोई सलाम कर रहा है।
बेटी की लगन देख पिता ने भी उसे हौसला बढ़ाया और खुद में संघर्ष का बल प्रबल करते हुए बेटी के सपनों को सच करने के लिए समाज में एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत कर दिया कि बेटियों को कमजोर न समझें बल्कि हर स्थिति परिस्थिति में उनका हौंसला बढ़ाए। फिर चाहे उसके लिए आपको कितनी ही दुश्वारियां न झेलनी पड़े। आज इस बेटी को मदद की दरकार भी है।

गोद में उठा कर ले जाता है एक पिता अपनी बेटी को शिक्षा के मंदिर में
तस्वीर चित्रकूट के सरैयां ग्राम पंचायत स्थित प्राथमिक विद्यालय बाई कुआ की है। अचानक सभी की नजरे प्रतिदिन की तरह एक व्यक्ति पर टिक जाती हैं और बच्चों की भीड़ में से उसे रास्ता देने के लिए जगह बनने लगती है। इस व्यक्ति की गोद में उसकी बेटी है। अपनी बेटी रीना को चंद्रभान नाम का व्यक्ति प्रतिदिन इसी तरह विद्यालय ले जाता है और फिर उसे वापस लाता है। चंद्रभान की इज्जत इसलिए और भी बढ़ गई है विद्यालय प्रबंधन छात्रों और इलाकाई बाशिंदों के बीच क्योंकि उसने अपनी बेटी के सपनों को सच करने का बीड़ा उठाया है और बेटी की लगन देखते हुए उसका भी हौंसला कुंलाचे मारता है।

दोनों पैरों से दिव्यांग है बेटी
दरअसल रीना दोनों पैरों से दिव्यांग है। वह चल नहीं सकती और न ही पैरों पर किसी भी तरह खड़ी हो सकती है। कुदरत की इस चुनौती को रीना और उसके पिता चंद्रभान ने स्वीकार्य करते हुए अपने हौंसले को कम नहीं होने दिया और जब बेटी ने पिता से कहा कि वह पढऩा चाहती है और जीवन में कुछ बनकर अपने गांव देश समाज घर परिवार का नाम रोशन करना चाहती है तो पिता चंद्रभान ने उसे न तो डांटा और न फटकार लगाई और न ही उसकी शारीरिक दिव्यांगता को उसे एहसास होने दिया और न ही पढऩे से मना किया बल्कि खुद पिता ने बेटी को आगे बढऩे के प्रेरित करते हुए उसे स्कूल पहुंचाने का जिम्मा उठाया।

मदद की दरकार
बेहद गरीब परिवार के चंद्रभान के पास हाल फि़लहाल इतनी व्यवस्था नहीं कि वह अपनी बेटी को ट्राई साईकिल दिलवा सके। घर से विद्यालय की दूरी लगभग डेढ़ किलोमीटर है और प्रतिदिन रीना को उसके पिता स्कूल छोडऩे और ले जाने आते हैं, पिता के न रहने पर उसके दादा ये जि़म्मेदारी उठाते हैं। पिता चंद्रभान ने कहा कि यदि किसी सरकारी या प्रशासनिक स्तर से बेटी को ट्राई साईकिल मिल जाए तो उसे स्कूल आवागमन में सुविधा होगी चूंकि उसकी बेटी पढऩा चाहती है, इसलिए वे उसका मन छोटा नहीं करना चाहते और उसे इसी तरह विद्यालय पहुंचाते हैं।

मिला आश्वासन
विद्यालय प्रबंधन से जब इस बारे में पूछा गया तो बताया गया कि छात्रा को ट्राई साईकिल दिलवाने के लिए उसका नाम प्रशासन के पास भेजा गया है। उम्मीद है कि जल्द ही उसे साईकिल मिल जाएगी। वहीं कई समाजसेवियों ने भी रीना के पिता को जल्द मदद का आश्वासन दिया है। फि़लहाल देखना है कि कितनी जल्द जिम्मेदारों का ध्यान इस बेटी की ओर जाता है।

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