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लंका दहन के बाद आज भी यहां पर विराजमान हैं हनुमान जी, शांत कर रहे अग्नि की गर्मी

ऐसी मान्यता है कि श्री राम भक्त हनुमान कलयुग में जागृत अवस्था में इस धरती पर विराजमान हैं

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लंका दहन के बाद आज भी यहां पर विराजमान हैं हनुमान जी, शांत कर रहे अग्नि की गर्मी

चित्रकूट. ऐसी मान्यता है कि श्री राम भक्त हनुमान कलयुग में जागृत अवस्था में इस धरती पर विराजमान हैं और अपने भक्तों का कल्याण करते हैं। हनुमान जी से सम्बंधित न जाने ऐसे कितने स्थान हैं जो आज भी अनसुलझे रहस्यों से कम नहीं। ऐसा ही एक स्थान है यूपी के चित्रकूट जिले में हनुमानधारा नाम का। ऊंचे पहाड़ पर स्थित इस स्थान की रहस्मयी गुफा में आज भी हनुमान विराजमान हैं ऐसी मान्यता है। लेकिन क्या है इस गुफा और श्री राम भक्त हनुमान के विराजमान होने का रहस्य इसका उत्तर आपको आगे मिलेगा।

लंका दहन से सम्बन्ध है इस रहस्मयी गुफा का

ये तो सभी जानते हैं कि भगवान राम का सन्देश लेकर लंका गए हनुमान ने पूरी लंका को जलाकर राख कर दिया था। महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण व् गोस्वामी तुलसीदास रचित श्री रामचरित मानस में लंका दहन का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस गुफा का सम्बन्ध भी उसी लंका दहन से है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक लंका दहन के बाद शरीर में अग्नि से उत्पन्न हुई गर्मी(जलन) को शांत करने के लिए श्री राम ने हनुमान को चित्रकूट में निवास करने का आदेश दिया। अपने प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए हनुमान चित्रकूट के इसी गुफा में विराजमान हो गए।

अदृश्य स्रोत से निकलती है जलधारा

हनुमानधारा नाम से विख्यात इस गुफा में हनुमान के हृदय को शीतल कर रही है अदृश्य जगह(स्रोत) से निरंतर निकलती जलधारा। पौराणिक मान्यताओं व जनश्रुति के अनुसार भगवान राम से जब हनुमान ने अपने शरीर में उत्पन्न गर्मी के निराकरण के उपाए के बारे में पूछा तो श्री राम ने हनुमान को चित्रकूट के पहाड़ पर रहने का आदेश दिया और अपने बाण से उसी पहाड़ पर जलश्रोत उत्पन्न किया जिसे हनुमानधारा के नाम से जाना जाता है। गुफा में विराजे हनुमान जी के बाएं अंग पर अदृश्य जगह से निकलते जलश्रोत का रहस्य आजतक कोई नहीं जान पाया। भीषण गर्मी में भी ये जल नहीं सूखता। आस्थावानों में इस स्थान को लेकर अपार श्रद्धा है। विभिन्न असाध्य रोगों के निवारण के लिए भी भक्त इस जल को अपने साथ ले जाते हैं। पहाड़ पर अनेकों गुफाएं व् कन्दराएँ इस बात को प्रमाणित करती हैं की इन जगहों पर बड़े बड़े तपस्वियों ने तपस्या की है। महंत दिव्य जीवनदास जानकारी देते हुए बताते हैं कि लंका दहन के पश्चात् शरीर में अग्नि के कारण उत्पन्न हुई जलन को शांत करने के लिए जब हनुमान जी ने अपने आराध्य प्रभु श्री राम से उपाय पूछा तो श्री राम ने उन्हें चित्रकूट के इसी स्थान पर रहने का आदेश दिया और फिर यहां अदृश्य जल स्रोत से एक जलधारा उत्पन्न हुई। कहा जाता है कि श्री राम के द्वारा ये जलधारा उत्पन्न की गई। खास बात यह कि वाकई में आज तक हनुमान जी की मूर्ति पर निरंतर पड़ने वाली जलधारा के निकलने और विलीन होने का स्रोत नहीं मिल पाया है। यहां का जल अमृत के समान माना जाता है और कभी नहीं सूखता। कहा जाता है की आज भी हनुमान धारा के पहाड़ पर कई साधू संत जनकल्याण के लिए तपस्यारत हैं और उन्हें हनुमान की कृपा प्राप्त है।