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लंका विजय के बाद भगवान राम ने सबसे पहले यहां किया था दीपदान, भाई दूज तक चलता है दीपदान का मेला

- अनोखी है चित्रकूट की दीपावली- लंका विजय के बाद भगवान राम ने पहले यहां किया था दीपदान - हर वर्ष पांच दिनों तक लगता है दीपदान मेला, उमड़ते हैं लाखों श्रद्धालु- चित्रकूट में दीपदान करने से पूरी होती हैं मनोकामनाएं- धनतेरस से भाई दूज तक चलता है दीपदान मेला

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UP Travel Guide

चित्रकूट को भगवान राम की तपोभूमि के नाम से जाना जाता है

विवेक मिश्रा
चित्रकूट. UP Travel Guide चित्रकूट को भगवान राम की तपोभूमि के नाम से जाना जाता है। यहां कण-कण में श्रीराम बसते हैं। युगों-युगों से दीपावली के पर यहां दीपदान की परम्परा चली आ रही है। कहा जाता है कि लंका विजय के बाद अयोध्या वापस लौटते समय सबसे पहले श्रीराम ने यहीं पर दीपदान कर ऋषि-मुनियों का आशीर्वाद लिया था। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरितमानस के लंका काण्ड में लिखा है-
सकल रिषिन्ह सन पाई असीसा, चित्रकूट आए जगदीसा।
तहं करि मुनिन्ह केर संतोषा, चला विमानु तहां ते चोखा।
अर्थात सभी ऋषियों से आशीर्वाद पाकर श्रीराम जी चित्रकूट आए। यहां उन्होंने मुनियों को संतुष्ट किया फिर उनका विमान अयोध्या के लिए उड़ गया। तभी सेे हर दिवाली पर भगवान राम की तपोभूमि में आस्था का सैलाब उमड़ता है।

14 वर्षों के अपने वनवासकाल का सर्वाधिक समय भगवान राम ने चित्रकूट में ही बिताया था। साढ़े ग्यारह वर्ष भगवान राम ने यहां प्रवास किया था। आज भी कई ऐसे स्थान हैं जहां राम के प्रवास के प्रमाण मिलते हैं। उनके पदचिन्ह दिखते हैं।

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यूं तो हर जगह की दिवाली अपने आप में खास होती है, लेकिन चित्रकूट की पवित्र मंदाकिनी नदी के तट रामघाट पर दीपावली की रात जो दृश्य देखने को मिलता है वह स्वर्ग के दृश्य से कम नहीं है। मानो पूरी आकाश गंगा जमीं पर उतर आई हो। नदी की मध्यम गति में अठखेलियां करते दीये झिलमिल रोशनी प्रकट करते हुए नयनाभिराम दृश्य उत्पन्न करते हैं। मंदाकिनी के तट पर लगने वाले इस दीपदान मेले की परंपरा कोई सौ दो सौ या हजार वर्षों से नहीं, बल्कि युगों से चली आ रही है। कई धार्मिक पुराणों ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। दीपदान मेला धनतेरस से लेकर भाई दूज (पांच दिन)तक चलता है।

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कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा से पूरी होती है मनोकामनाएं
पवित्र मंदाकिनी नदी में स्नान ध्यान व दीपदान करने के बाद कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा करने की भी परम्परा है। कहा जाता है जीवन में किसी भी प्रकार का दैहिक दैविक और भौतिक कष्ट हो तो दीपावली के अवसर पर मंदाकिनी नदी के तट पर दीपदान व तदुपरांत कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा करने से सारे कष्टों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। श्री रामचरितमानस में कहा भी गया है कि 'कामदगिरि भये राम प्रसादा, अवलोकत अपहरत विसादा' यानी कामदगिरि भगवान राम के प्रसाद के रूप में विद्यमान हैं और सभी तरह के पाप ताप दूर करते हैं हरते हैं।

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बिना किसी बुलावे व आयोजन के बावजूद उमड़ते हैं लाखों श्रद्धालु
बिना किसी सरकारी व प्रशासनिक आयोजन के बावजूद लाखों श्रद्धालु दीपदान के लिए उमड़ते हैं। दीपावली पर हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान राम की तपोभूमि पर पहुंचते हैं। दीपावली पर. खास बात यह कि आज तक इस भव्य व प्राचीन ऐतिहासिक परम्परा को किसी सरकार व प्रशासन ने नहीं बल्कि आस्था की मजबूत डोर ने संभाले रखा. अलबत्ता मेले में सुरक्षा व्यवस्था व अन्य मूलभूत सुविधाओं को लेकर पिछले कुछ वर्षों में जरूर सरकारी सिस्टम में जागरूकता आई है।

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दो राज्यों के बीच लगता है मेला
दीपदान मेला चित्रकूट के यूपी व एमपी (मध्य प्रदेश) वाले हिस्से में लगता है, क्योंकि चित्रकूट का आधा भाग यूपी तो आधा एमपी में पड़ता है। इसी तरह कामदगिरि पर्वत का भी आधा हिस्सा यूपी व आधा एमपी में स्थित है। दोनों राज्यों की पुलिस व प्रशासन के जिम्मे होती है मेले की सुरक्षा व्यवस्था।

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