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चित्तौड़गढ़: नायब तहसीलदार बन ANM और CHO से ठगी, एप पर नाम देख झांसे में आए सीएचसी प्रभारी

Truecaller Identity Fraud: चित्तौड़गढ़ जिले के पारसोली क्षेत्र में साइबर ठगों ने अब सरकारी तंत्र का मुखौटा पहनकर स्वास्थ्यकर्मियों को अपना शिकार बनाया है। एक शातिर ठग ने खुद को चित्तौड़गढ़ कलक्ट्रेट का नायब तहसीलदार बताकर झांसा दिया और स्वास्थ्य विभाग की तीन महिलाकर्मियों से कुल 1 लाख 12 हजार रुपए ठग लिए।

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फर्जी नायब तहसीदार बन एएनएम और सीएचओ से ठगी, पत्रिका फाइल फोटो

Truecaller Identity Fraud: चित्तौड़गढ़ जिले के पारसोली क्षेत्र में साइबर ठगों ने अब सरकारी तंत्र का मुखौटा पहनकर स्वास्थ्यकर्मियों को अपना शिकार बनाया है। एक शातिर ठग ने खुद को चित्तौड़गढ़ कलक्ट्रेट का नायब तहसीलदार बताकर झांसा दिया और स्वास्थ्य विभाग की तीन महिलाकर्मियों से कुल 1 लाख 12 हजार रुपए ठग लिए। ठगी का अहसास होने पर पीड़िताओं ने पारसोली थाने और साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई है।

नायब तहसीलदार नाम से नंबर सेव

ठग ने ट्रूकॉलर पर अपना नाम अशोक मीणा नायब तहसीलदार सेव कर रखा था। उसने सबसे पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) पारसोली के प्रभारी को फोन किया और खुद को चित्तौड़गढ़ कलक्ट्रेट का अधिकारी बताया। प्रभारी ने ट्रूकॉलर पर नाम देखकर बिना किसी आधिकारिक आदेश या वेरिफिकेशन के क्षेत्र के उप स्वास्थ्य केंद्रों और वहां तैनात एएनएम व अन्य स्टाफ की पूरी जानकारी ठग से साझा कर दी।

अधिकारी बन मंगवाईं तस्वीरें, फिर ठगा

प्रभारी से नंबर और जानकारी चुराने के बाद ठग ने महिला स्वास्थ्यकर्मियों से सीधे संपर्क साधा। उसने कहा कि उप स्वास्थ्य केंद्रों में स्वच्छता और रखरखाव के लिए सरकारी बजट जारी होना है। विश्वास जीतने के लिए उसने केंद्रों के फोटो भी मंगवाए। फिर प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर एडवांस राशि की मांग की। ठग के झांसे में आकर पाट खुर्द की एएनएम विमलेश गुर्जर ने 10 हजार, राजगढ़ की एएनएम नर्मदा राठौड़ ने 46 हजार और राजगढ़ की सीएचओ संगीता गुर्जर ने 56 हजार रुपए फोन-पे के जरिए ट्रांसफर कर दिए। बजट नहीं आने पर जब विभागीय स्तर पर पड़ताल की गई, तब ठगी का खुलासा हुआ।

बड़ा सवाल

सिर्फ ट्रूकॉलर देखकर प्रभारी ने कैसे दे दी स्टाफ की सीक्रेट जानकारी? इस पूरे मामले में साइबर ठग की चालाकी से ज्यादा सीएचसी प्रभारी की लापरवाही हैरान करने वाली है।

चूक 1: किसी अज्ञात नंबर से आए फोन पर बिना आधिकारिक आदेश के सरकारी कर्मचारियों का डेटा कैसे साझा कर दिया गया?

चूक 2: क्या कलक्ट्रेट का कोई अधिकारी सीधे ब्लॉक स्तर पर फोन करके मौखिक जानकारी मांगता है? प्रभारी इस बुनियादी प्रोटोकॉल को क्यों भूल गए?

प्रभारी की इस एक लापरवाही के कारण उनकी तीन अधीनस्थ महिला कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई ठग के खाते में चली गई। क्या विभाग इस लापरवाही पर कोई कार्रवाई करेगा?

पत्रिका अलर्ट: ट्रूकॉलर पर अंधविश्वास भारी पड़ेगा
साइबर ठगी के बढ़ते मामलों को देखते हुए आमजन और सरकारी कर्मचारी इन बातों का विशेष ध्यान रखें।

नाम पर न जाएं

ट्रूकॉलर ऐप पर कोई भी व्यक्ति अपना नाम बदलकर 'कलक्टर', 'तहसीलदार' या 'एसपी' लिख सकता है। यह पहचान का कानूनी प्रमाण नहीं है। कोई भी सरकारी विभाग या बैंक किसी भी प्रकार का फंड या लॉटरी जारी करने के लिए पहले 'एडवांस' पैसे जमा करने को नहीं कहता। यदि कोई बड़ा अधिकारी बनकर फोन करे, तो तुरंत अपने विभाग के उच्चाधिकारियों या कंट्रोल रूम से उस नंबर की सत्यता जांचें।

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