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राजस्थान के इस बड़े सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाएं गड़बड़ाई, आमजन को सुधार को लेकर इंतजार, अस्पताल में सामान्य रोगियों की देखभाल में आ रही समस्या

कभी भामाशाह डेडराज भरतिया परिवार की देन यह अस्पताल जिले के नामचीन अस्पतालों में गिना जाता था, लेकिन आज चले निर्माण कार्य से चिकित्सीय व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

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चूरू. जिले का सबसे बडे राजकीय डेडराज भरतिया अस्पताल की व्यवस्थाओं में आए बिखराव में कब तक सुधार होगा यह तो कहना मुश्किल है लेकिन यहां आने वाले रोगियों को सुचारू रूप चिकित्सीय सुविधाएं मिलें इसका उन्हें इंतजार है।

बिखरी स्वास्थ्य व्यवस्था

कभी भामाशाह डेडराज भरतिया परिवार की देन यह अस्पताल जिले के नामचीन अस्पतालों में गिना जाता था, लेकिन आज चले निर्माण कार्य से चिकित्सीय व्यवस्था प्रभावित हो रही है। अस्पताल के अग्रभाग में जहां पहले सुव्यवस्थित आउट पेशेंट डिपार्टमेंट (ओपीडी) संचालित होता था और विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा मरीजों को एक ही स्थान पर परामर्श, जांच और उपचार की सुविधा मिलती थी, वहां अब नया भवन खड़ा किया जा रहा है। पुराने ढांचे को ध्वस्त करने के बाद शुरू हुआ यह निर्माण कार्य सुस्त रफ्तार से चल रहा है। इससे पूरे चिकित्सा व्यवस्था प्रभावित हो रही है। इसलिए इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले मरीज आज सुचारू चिकित्सा सेवाओं की बहाली का इंतजार कर रहे हैं।

वैकल्पिक व्यवस्था

चिकित्सा जैसी संवेदनशील व्यवस्था में जहां विकास कार्य तेज गति से पूरे होने चाहिए, वहां कछुआ चाल से चल रहा निर्माण कार्य पूरे सिस्टम पर भारी पड़ रहा है। वैकल्पिक व्यवस्थाएं भी मरीजों के लिए मुसीबत बन गई हैं। एक-एक कक्ष में 8-8 डॉक्टर सामान्य मरीजों को देखने को मजबूर हैं, जबकि भर्ती वार्ड को ट्रॉमा सेंटर के ऊपर बनाया गया है। जांच के लिए मरीजों को ट्रॉमा से आगे पुरानी विंग में भटकना पड़ रहा है, दूसरी ओर मातृ-शिशु स्वास्थ्य केंद्र अलग संचालित हो रहा है। अस्पताल प्रशासन की ओर से की गई वैकल्पि व्यवस्था रास नहीं आ रही है।

इलाज से ज्यादा जूझ रहा मरीज

अस्पताल परिसर की हालत बेतरतीब है। एक तरफ निर्माण कार्य चल रहा है तो दूसरी कचरा फैल रहा है। पर्ची काउंटरों पर उमड़ीभीड़ और दवा काउंटरों पर लंबी कतारें मरीजों की परेशानी बढ़ा रही हैं। परिसर में बेतरतीब खड़े वाहनों से हालात बिगड्र रहे है। मुख्य द्वार के पास ही मातृ-शिशु केंद्र और दूसरी ओर आपातकालीन वार्ड के बाहर वाहनों की कतारें लगी रहती हैं, जिससे आवाजाही तक मुश्किल हो जाती है। डॉक्टरों को एक छोर से दूसरे छोर तक भागना पड़ रहा है तो रोगियों को इंतजार करना पड़ रहा है। अकबर अली कुरैशी का कहना है कि सरकारी अस्पताल पर भरोसा कर यहां आए थे, लेकिन यहां की अव्यवस्थाओं ने उन्हें पूरी तरह थका कर रख दिया।

साफ सफाई कमजोर

अस्पताल की सफाई व्यवस्था कमजोर है। प्रशासनिक अधिकारियों के बार-बार निर्देशों के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं। हाल ही में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. एम.एम. पुकार ने निरीक्षण कर निर्देश दिए थे, लेकिन नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’ साबित हुआ। सबसे बदहाल स्थिति शौचालयों की है, कहीं दरवाजे तक नहीं हैं तो कहीं खिड़कियां टूटी हुई हैं।