
चूरू. जंगल जीवन की अहम कड़ी गिद्ध की कई प्रजातियां विलुप्ती की कगार पर है। इंसानी लालच ने इस बड़ी चिडिय़ा के जीवन को संकट में डाल दिया है। कोरोना महामारी ने इंसानों को तो खूब तकलीफ दी। मगर, प्रकृति के लिए इसका कालखंड वरदान साबित हुआ। इस महामारी के चलते लगे लॉकडाउन ने प्रकृति को सुधरने का अवसर दिया तो खात्मे की डगर पर खड़ी कई जीव-जंतुओंं की प्रजातियां फिर से दिखने लगी। इसी कड़ी में बात करेंगे गिद्धों की। जिनकी चार प्रजातियां रेड डाटा बुक में खत्म होने वाली चिडिय़ा के तौर पर दर्ज हैं। गिद्ध जंगल के मुर्दाखोर पक्षी के तौर पर भोजन शृंखला की अहम कड़ी माने जाते हैं। इन्हें पक्षियों का सफाईकर्मी भी गिना जाता है। रेगिस्तान के बियाबान धोरों में मुख्य तौर पर लॉन्ग बील्ड व व्हाईट बैक्ड वल्चर के अलावा सिनेरियस वल्चर दिखते हैं। बीते दो दशक पूर्व ये अचानक विलुप्त होने लगे। पक्षी विशेषज्ञ इसकी वजह कई प्रतिबंधित दवाइयों को पशुओं को खिलाना बता रहे हैं। जिसमें सबसे अधिक पशुओं की दी जाने वाली दर्द निवारक दवा इनके खात्मे का कारण बनीं है। अब कई प्रजातियां फिर से नजर आने लगी है। जो कि प्रकृति के सुधरने का एक सुखद संकेत माना जा रहा है।
तालछापर आती है ये प्रजातियां
दिसम्बर के महीने में सर्दी के मौसम के परवान होने पर गिद्धों की कई प्रजातियां हजारों किमी का सफर तय कर तालछापर अभयारण्य में अपना डेरा डालती हैं। जिनमें मुख्य तौर पर इजिप्शीयन, हिमालय ग्रीफोन, यूरेशियन ग्रीफोन, सिनेरियस एवं व्हाईट रमड आदि प्रजाति के गिद्ध कजाकिस्तान, रूस, अफगानिस्तान व साइबेरिया आदि देशों से शीतकाल में भोजन की तलाश में यहां आते हैं। पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में गिद्धों की कुल नौ प्रजातियां मिलती हैं। जिनमें से चार प्रजातियां विलुप्ती की कगार पर हैं। तालछापर मेें सिनेरियस, लॉन्ग बील्ड व व्हाईट बैक्ड स्थानीय प्रजाति के तौर पर बसेरा करती हैं। इस बार तालछापर में 100 से भी अधिक गिद्ध आए हैं। बीते कई वर्षों में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर गिद्ध यहां आए हैं।
पुराणों में भी जिक्र है गिद्धों का
इस बड़ी चिडिय़ा का पुराणों में भी खास महत्व बताया गया है। गिद्धों का जिक्र रामायण में भी है। प्रभु श्रीराम के वनवास के दौरान मां सीता के हरण के समय गिद्धराज जटायु ने दशानन से युद्ध किया था। जानकी को बचाने के लिए गिद्धराज जटायु ने अपने प्राणों की आहुती दी थी। गिद्धराज ने सीता की खोज में निकले हनुमान, अंगद व जाम्वंंत आदि को पूरी घटना बताने के बाद प्रभु श्रीराम की गोद में अपने प्राण त्यागे थे। गरुड़ पुराण में भी महातम्य बताया गया है गिद्ध का। इसके अलावा हमारे देश में पारसी धर्म के लोग परिजनों की मौत होने के बाद उनके शवों के अंतिम संस्कार के लिए परंपरा के तौर पर गिद्धों पर आश्रित रहते हैं। सदियों से पारसी समुदाय को गिद्ध इको सिस्टम के तहत सेवाएं प्रदान कर रहे हैं।
स्वच्छता के प्रहरी हैं गिद्ध
पक्षी विशेषज्ञों के मुताबिक जंगल की दुनिया में गिद्ध एक परभक्षी चिडिय़ा है। लंबी गर्दन व बड़ी चोंच वाली इस चिडिय़ा के पंखों का फैलाव एक मीटर से भी अधिक होता है। इसके पंजे मजबूत होने हैं। यह आसमान में सैंकड़ों मीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरता है। इसकी आंखों में देखने की अद्भुत क्षमता होती है। ये हजारों फीट की ऊंचाई से भी मृत पशुओं के शवों को देख लेता है। इसके बाद इनका झुंड मृत पशुओं के शव को कुछ ही देर में चट कर जाता है। इस तरह से ये पर्यावरण को साफ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन्हें पर्यावरण का प्राकृतिक सफाई कर्मी माना जाता है। मरे हुए जानवरों को अपना निवाला बनाकर जंगल में संक्रमण फैलने से रोकते हैं।
टॉपिक एक्सपर्ट...
तालछापर के रेंजर उमेश बागोतिया के मुताबिक बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के विश्लेषण के अनुसार पशुओं को दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डायक्लॉफिनॉक्स सोडियम व मेलोक्सिकौम के अलावा कई तरह के पेस्टिसाइड हमारे देश में गिद्धों की विलुप्ती का सबसे बड़ा कारण बनीं है। रेंजर के मुताबिक घरेलु पशुओं के शरीर में इन दवाओं का असर लंबे समय तक रहता है। पशु की मौत होने के बाद जब गिद्ध उन्हें खाते हैं तो मांस के साथ इन दवाओं के तत्व भी उनके शरीर में चले जाते हैं। इससे गिद्धों की आंतों व गुर्दों में संक्रमण फैल जाता है। जिससे उनकी मौत हो जाती है। इसके अलावा शिकारियों द्वारा कई जंगली पशुओं के शिकार के समय जहरीले भोजन का सहारा लिया जाता है। जहरीले भोजन के सेवन से मरने वाले पशुओं के शवों को खाने से भी गिद्धों की मौत हो जाती है।
Published on:
04 Mar 2024 09:50 am
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