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चूरू के इस गांव ने आधुनिक दौर के बीच ग्रामीण संस्कृति को बनाए रखा

2011 की जनगणना के अनुसार गांव की आबादी 1952 रही, जिसमें महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। साक्षरता के क्षेत्र में भी गांव ने उल्लेखनीय प्रगति की है। खेती और पशुपालन से आगे बढ़ते हुए यहां के लोग व्यापार, परिवहन, फर्नीचर निर्माण, आयरन उद्योग और मिठाई व्यवसाय से जुड़े।

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आपणो गांव

चूरू. जिला मुख्यालय से केवल मात्र 5 किलोमीटर दूर गांधीग्राम रामसरा शहर के निकट होते हुए भी अपने गांव की परंपराओं को बनाए रखा। श्रम साधकों के इस गांव के लोग शहर से जुड़े रहे, व्यापार भी किया लेकिन आधुनिक दौर के बीच से गुजरकर भी यहां के ग्रामवासियों ने ग्रामीण संस्कृति को न केवल जीवित रखा बल्कि उसमें नवाचार कर गांव को नई पहचान दी।

गांव का भूगोल

चूरू-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग 52 (NH 52) तथा रतननगर बाइपास से जुड़ा यह गांव भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1790 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला रामसरा कृषि प्रधान गांव है, जहां अधिकांश भूमि असिंचित है, फिर भी यहां के किसान और पशुपालक मेहनत के बल पर आत्मनिर्भरता की दिशा में निरंतर आगे बढ़ते रहे हैं।

गांव का इतिहास

इतिहास की बात करें तो चूरू से पहले 12 बास में बसे इस गांव को पहले नीमहाले के नाम से जाना जाता था। 18वीं सदी में चूरू की रक्षा के लिए कुशलसिंह वंश के एक ठाकुर को यह गांव सौंपा गया, जिसके बाद इसका नाम रामसरा पड़ा। आजादी के आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तनों तक, गांव हर दौर में अडिग रहा।

खेतीबाड़ी से व्यापार तक सफर

2011 की जनगणना के अनुसार गांव की आबादी 1952 रही, जिसमें महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है। साक्षरता के क्षेत्र में भी गांव ने उल्लेखनीय प्रगति की है। खेती और पशुपालन से आगे बढ़ते हुए यहां के लोग व्यापार, परिवहन, फर्नीचर निर्माण, आयरन उद्योग और मिठाई व्यवसाय से जुड़े। चूरू शहर में गांव के व्यापारियों की 12 से अधिक दुकानें हैं।

अनेक सुविधाओं से सृजित है गांव

गांव में उपडाकघर, उप स्वास्थ्य केंद्र, बालक एवं बालिकाओं के लिए अलग राजकीय विद्यालय, खेल मैदान, आंगनबाड़ी केंद्र, बिजली-पानी की सुविधा और अच्छे आवागमन के साधन उपलब्ध हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ठाकुरजी, हनुमानजी, श्याम बाबा और गोगाजी के मंदिर आस्था के केंद्र हैं। गींधड़ नृत्य यहां की सांस्कृतिक पहचान है, जिसने राष्ट्रीय मंचों पर भी गांव को गौरव दिलाया।

गांव की शख्सियतें

शिक्षा और न्याय क्षेत्र में भी रामसरा ने अपनी अलग पहचान बनाई है। गांव के ईश्वरी प्रसाद प्रजापत जिला एवं सत्र न्यायाधीश रहे, जबकि गांव की बेटी उषा प्रजापत न्यायिक मजिस्ट्रेट बनकर महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनीं। विनोद मीणा अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश है। 2020 में महेन्द्र मीणा मुसिंफ एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट बने। वर्तमान में कई युवक-युवतियां विधि शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। वैद्य गोविन्द शर्मा ने बताया कि गांव के पांच वैद्यों ने आयुर्वेद में सेवाए दी। समाजसेवी सांवरमल ने स्वास्थ्य केन्द्र के लिए एक बीघा और बालिका स्कूल के लिए दो बीघा जमीन दान देकर गांव के विकास में योगदान दिया।

रामसरा बना ग्राम पंचायत

पूर्व में खासोली ग्राम पंचायत में रहा रामसरा अभी पंचायतों के हुए पुनर्गठन में ग्राम पंचायत बन गया है। सरपंच लक्ष्मी प्रजापत और उपसरपंच रहे रामेश्वर प्रजापत ने बताया कि गांव में एक दौर ऐसा भी आया कि अन्ना हजारे के गांव से प्रशिक्षण लेकर आए युवाओं ने गांव के विकास की नई इबारत लिखी। ग्राम पंचायत बने रामसरा के समक्ष नहरी पानी, जल निकासी और सिंचाई जैसी चुनौतियां हैं, लेकिन ग्रामीणों की एकजुटता और पूर्व में गांधीग्राम अभियान की सफलता यह संकेत देती है कि रामसरा भविष्य में भी विकास और संस्कृति का संतुलित उदाहरण बना रहेगा।