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यहां अक्षय तृतीया पर होता है मिट्टी के दूल्हा-दुल्हन का विवाह, ये है प्रथा

बट वृक्ष के नीचे बच्चियां करती हैं वैवाहिक कार्यक्रम, भोजन में उपलब्ध होती है उबली हुई चने की दाल

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In Bundelkhand, Akshay Tritiya is married to the groom's bride and groom

In Bundelkhand, Akshay Tritiya is married to the groom's bride and groom

दमोह. अक्षय तृतीया विवाह समारोह के लिए विशेष मुर्हूत माना जाता है, इस मुर्हूत में सर्वाधिक शादियां होती हैं। सरकारी शादियां भी इस दिन आयोजित होने लगी हैं। बुंदेलखंड में मिट्टी के दूल्हा-दुल्हन जिन्हें पुतरा-पुतरियां बोला जाता है, इनका विवाह गली मोहल्लों से लेकर आपको पूरे बुंदेलखंड में दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक कहीं भी होते हुए नजर आए जाएंगे।


मिट्टी के दूल्हा-दुल्हन जिन्हें बुंदेलखंडी में पुतरा-पुतरियां कहा जाता है यह विवाह समारोह छत्तीसगढ़ में भी हमें देखने मिलते हैं, जिन्हें पुतला-पुतलियों का विवाह कराना माना जाता है। बुंदेलखंड व छत्तीसगढ़ में मिट्टी के दूल्हा-दुल्हन का विवाह प्राचीनकाल से चला आ रहा है। यह परंपरा किस उद्देश्य से शुरु हुई थी, इसके प्रमाणिक लेख तो कहीं नहीं मिलते हैं, लेकिन बुजुर्गों के अनुसार बालिकाओं द्वारा अक्षय तृतीया के अबूझ मुर्हूत पर यह विवाह बट वृक्ष के नीचे कराया जाता है तो उनका आने वाला दांपत्य जीवन सुखद माना जाता है। वहीं दूसरी ओर इस विवाह को धर्म से भी जोड़ा गया है कि इस दिन बट या पीपल के नीचे जो भी धर्म कार्य किया जाए उनका आध्यत्मिक महत्व है। हालांकि छत्तीसगढ़ में पुतला-पुतलियों के आड़ में नाबालिग बच्चों के विवाह होने लगे थे, जहां पर सरकार ने इस पर अंकुश लगाया है। हालांकि बुंदेलखंड में ऐसी कोई स्थिति नहीं है। जिससे अक्षय-तृतीया पर हर घर में मिट्टी के दूल्हा-दुल्हन का विवाह पूजा पाठ के रूप में कराया जाता है। यहां बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया के अवसर पर घरों पर पेड़ों के नीचे होने वाली विवाह पद्धति में मिट्टी के घड़े व बांस से बने हुए टुकना-टुकनियों का इस्तेमाल किया जाता है।
कुंभकारों द्वारा लाखों की तादाद में मिट्टी के दूल्हन बनाए गए हैं। जिनमें शूटेड-बूटेड के अलावा घाघरा-चोली व शेरबानी में भी निर्माण किया गया है। दूल्हा-दुल्हन का श्रंगार बदलने का असर इस बार बनाए गए मिट्टी के पुतरा-पुतरियों में नजर आने लगे हैं।
बुजुर्ग बताते हैं कि पहले बांस और मिट्टी से बने पुतरा-पुतरियों का चलन था। जैसे जैसे दूल्हा-दुल्हन के श्रंगार बदलते गए वैसे-वैसे मिट्टी के दूल्हा-दुल्हन भी बदल गए हैं। स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन इनकी डिमांड आज भी है। शहर हो या गांव समूचे बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया पर घर-घर प्राचीन परंपरा अनुसार मिट्टी के दूल्हा-दुल्हन का विवाह यानि पूजा अर्चना की जाएगी।