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बंदूक के फायर से फोड़े जाते हैं नारियल

रक्षा बंधन के दूसरे दिन गोलियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठता है आसमान, अचूक निशानेबाज को सम्मानित करते चले आ रहे हैं सरपंच, बर्धा गांव में पूर्वजों से चली

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alka jaiswal

Aug 07, 2017

दमोह. बुंदेलखंड विभिन्न परंपराओं से भरा हुआ है। अब भले ही राजा महराजा नहीं रहे हों रजवाड़े भी चले गए हों, लेकिन उनके समय से चली आ रही विभिन्न परंपरा बुंदेलखंड में आज भी चल रही हैं।
जिले के हटा जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत बर्धा में प्रति वर्ष रक्षा बंधन के दूसरे दिन लाइसेंसी बंदूक से निशानेबाजी की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। इस प्रतियोगिता में नारियल रखे जाते हैं जो बंदूक की गोली से फोडऩे पड़ते हैं। लगाने वाले को ग्राम सरंपच समान के साथ पुरूस्कार राशि प्रदान करता है। ग्रामीण बताते है आजादी के बाद से ही गांव में कजुलियों के रोज अचूक निशाने बाज को गांव का मुखिया पुरस्कार वितरण करता आ रहा है, वर्तमान में यह सरपंच के जिम्मे होता है।
गांव के बसस्टैंड पर तालाब की पार पर लगे एक प्राचीन नीम के पेड़ पर लगभग 50 फुट की ऊंचाई पर एक एक रस्सी के सहारे नारियल को लटकाया जाता है। जिसे लगभग 100 फुट की दूरी से बंदूक का निशाना लगा कर तोडऩे की शर्त होती है। गांव के विभिन्न निशानेबाज अपनी लाईसेंसी बंदूक से नारियल पर निशाना साधते हैं। जिस निशानेबाज का सटीक निशाना नारियल पर लगता है। उसे ग्राम सरपंच पुरस्कार देकर सम्मानित करता है। खास बात यह है यहां कई राउंड फायर होते हैं। जब तक नारियल में निशाना नहीं लगता तब तक पारी-पारी से निशाने बाज हाथ अजमाते रहते हैं।
पूर्व सरपंच प्रदीप गुप्ता का कहना है कि पूर्वजों के समय से बंदूक द्वारा नारियल तोडऩे की परंपरा चली आ रही है। गांव में बहुत पहले से लाइसेंसी बंदूके रही हैं। वर्ष में एक बार इस बहाने बंदूक चलाने का भी अभ्यास हो जाता है और निशाना परखने का मौका भी मिलता है।
यहां के सरपंच राजाराम दहायत का कहना है कि राजा महराजाओं के शौक हुआ करते थे। हमारे यहां परंपरा पुरानी है, लेकिन आज भी ग्राम के लोग उस परंपरा को जीवित रखे हुए है। मंगलवार को आयोजित निशानेबाजी में जो सटीक निशाना लगाएगा उसका समान होगा।