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महुआ की गंध के बाद गुली से गुलजार हुए जंगल

गुली एकत्रित करने में दो वक्त की रोटी आराम से चल जाती

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Gully began to collect tribal

Gully began to collect tribal

मडिय़ादो. जंगलों में अपे्रल से जून तक की गई मेहनत पूरे वर्ष का इंतजाम कर देती है। आदिवासियों को चार माह में जंगलों से महुआ, आचार, तेंदूपत्ता और गुली एकत्रित करने में दो वक्त की रोटी आराम से चल जाती है। इन दिनों वनांचल क्षेत्र के ग्रामीणों को आय का जरिया महुआ फल बने हुए हैं। तेंदूपत्ता सीजन समाप्त होने के बाद ग्रामीण अब जंगलों में महुआ के पेड़ों से गुली तोड़ कर उसके बीच से गिरी निकालते हुए दिख रहे हैं।
वर्ष भर का कर लेते है इंतजाम
मेहनत मजदूरी के साथ वनोपज से आदिवासी परिवारों की आजीविका निर्भर है। इनकी मानें तो गर्मियों में महुआ फूल, आचार, तेंदूपत्ता व अंतिम उपज गुली को एकत्र कर साल भर के लिए खर्च पानी की व्यवस्था हो जाती है। क्यों कि बारिश के मौसम में कोई काम नहीं रहता है, गर्मियों में एकत्रित कर बेची गई, वनोपज उन दिनों काम आती है जब कोई काम नहीं होता है।
लालू भील, गुबंदी, हरीराम आदिवासी का कहना है कि इस बार वनोपज में खास मुनाफा नहीं हुआ। तेंदूपत्ता खरीद ठेकेदार द्वारा नहीं की गई, महुआ ठीक था, अब उसमें फल पक चुके है जिसे तोडऩे के बाद उसके अंदर कि गिरी निकाल कर सुखाते हैं, सूखने के बाद उसे बेच देते हंै।
खाने के काम आता है तेल
महुआ के बीज जिसे गुली कहते हंै, इसकी गिरी का तेल आदिवासी खाने के उपयोग में लाते है। हलकाई आदिवासी का कहना है गुली का तेल बहुत फायदे मंद होता है, हालांकि गुली के तेल में हल्की कड़वाहट होती है, लेकिन इसके तेल से बने पकवान स्वादिष्ट होते है।
बफरक्षेत्र के मडिय़ादो, कलकुआ, घोघरा, कारीबरा, मनकपुरा, चौरईया, पाटन, बछामा, उदयपुरा, किसानपुरा, स्यामरसिंघी, बनोली गांवों के जंगलों में भारी संख्या में महुआ के पेड़ है। जिनसे आदिवासियों को अच्छी आय प्रतिवर्ष होती है।