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इस जिले के साइलेंट जोन पर एक बार जरूर आईए, मिलेगा विशेष अनुभव

मरीजों से बेखबर मचाते हैं सायलेंट जोन पर शोर अस्पताल चौक पर तेजगति से बचते हैं डीजे, स्पीकर

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The Silent Zone of this district will definitely get a special experience.

Patients of this hospital are forced to run and run, you want to know, then see the jar carefully ...

लक्ष्मीकान्त तिवारी, दमोह. जिला अस्पताल चौक जिसे लोग अंबेडकर चौक के नाम से जानते हैं। यहां पर आए दिन तेजगति से बजाए जा रहे लाउडस्पीकरों को लेकर अस्पताल प्रबंधन ने कलेक्टर से सायलेंट जोन बनाए रखने की मांग की है। हालांकि जिला अस्पताल होने से वैसे भी एनजीटी के आदेश के तहत व प्रदेश सरकार के आदेशानुसार यह चौक सायलेंट जोन में आते हैं। तत्कालीन कलेक्टर स्वतंत्रकुमार सिंह के समय अंबेडकर चौक को सायलेंट जोन घोषित किया था। लेकिन उनका आदेश नहीं चल सका। आए दिन तेज आवाज से चलाए जा रहे स्पीकरों को लेकर मरीजों के साथ अस्पताल स्टॉफ को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

धरना आंदोलन का स्थल बन चुका है अस्पताल चौक -
अस्पताल चौक पर आए दिन धरना प्रदर्शन का क्रम चलता रहता है। यहां पर किसी भी वर्ग समुदाय की सभाएं हों, किसी भी राजनैतिक दलों के प्रदर्शन या फिर पुतलादहन। सभी प्रकार के आंदोलनों का यह स्थाई स्थल बन चुका है। जिससे आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

पड़ता है मरीज व सामान्य व्यक्ति पर प्रभाव -
जिला अस्पताल में पदस्थ चिकित्सक आरएमओ डॉ. दिवाकर पटैल का कहना है कि सभी डॉक्टर्स व मरीज तेज आवाज में बचने वाले लाउडस्पीकरों से परेशान हैं। यहां तेज आवाज में लाउडस्पीकर बचने से मरीजों के साथ आम लोगों को भी परेशानी हो रही है। लाउडस्पीकर बचने से सबसे अधिक असर हार्ट के मरीजों पर पड़ता है, जिनसे धड़कनें तेज हो जाती हैं। ब्रेन पर व कान के पर्दे पर भी गहरा असर होता है। सिरदर्द के साथ बीपी भी बढ़ जाता है।
पूर्व कलेक्टर ने किया था सायलेंट जोन घोषित-
पूर्व में पदस्थ कलेक्टर स्वतंत्रकुमार सिंह ने करीब तीन साल पूर्व अस्पताल चौक व घंटाघर को सायलेंट जोन घोषित किया था। उसके बाद इसका पालन भी किया गया। लेकिन उनके बदलते ही यह आदेश हवा हो गया। जिसके बाद से न तो घंटाघर पर प्रदर्शन होने पर रोक लग सकी है, न ही अस्पताल चौक पर धरना प्रदर्शन पर रोक लगाई जा सकी है। जिससे आम लोगों के साथ मरीजों व डॉक्टरों के साथ समूचे अस्पताल स्टॉफ को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
एनजीटी के यह नियम पूर्व से हैं निर्धारित -
ध्वनि प्रदूषण को लेकर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 30 दिसंबर 2015 को सर्कुलर जारी किया गया था। जिसके तहत अस्पताल, स्कूल, न्यायालय परिसर, विवाह गार्डन साइलेंट जोन में शामिल किए गए थे। जारी इस आदेश की प्रतिलिपि कलेक्टर को भी भेजी गई थी। इसके साथ ही प्रावधान के पालन कराने के निर्देश भी दिए गए थे। दरअसल 25 डेसिबल ध्वनि विस्तारक यंत्र की क्षमता को शांति वातावरण में ही शामिल किया गया है।
80 डेसिबल या इससे अधिक मानव शरीर के लिए नुकसानदायक होती है। यही क्षमता 130 से अधिक होने पर पीड़ा दायक व खतरनाक साबित हो जाती है। यदि यही स्थिति कुछ घंटो तक बनी रहती है, तो बहरेपन की भी समस्या खड़ी हो सकती है। खास तौर पर साइलेंट जोन में डीजे साउंड सिस्टम तथा वाहनों के भारी क्षमता के फोन पर पर्यावरण विभाग द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है। यह आदेश यह आदेश नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी के मुताबिक स्कूल अस्पताल खेल मैदान को साइलेंट जोन में किया गया है। फिर भी दमोह में इस आदेश का पालन नहीं कराया जा रहा है।
आतिशबाजी भी होती है जमकर -
पर्यावरण व प्रदूषण बोर्ड का ध्यान भी नहीं रखा जाता है। अस्पताल चौक पर किसी भी अवसर पर जमकर आतिशबाजी की जाती है। जिससे ध्वनिप्रदूषण के साथ वायु प्रदूषण भी होता है। इसके अलावा बस, ट्रक, कार, बाइक व शहर के भीतर बड़ी मशीनों से बेतरतीब कंस्ट्रक्शन, डीजे साउंड सिस्टम व प्रेशर हॉर्न का उपयोग भी प्रतिबंधित किया गया है।

पत्रिका व्यू .....
०१-भारतीय संविधान अनुच्छेद २१ के तहत नागरिकों को एक सभ्य वातावरण व शांति में रहने व शांति से सोने का अधिकार है।
०२-शब्द शोर लैटिन शब्द "मतली" से लिया गया है इसे अवांछित ध्वनि, स्वास्थ्य और संचार के संभावित खतरे के रूप में परिभाषित किया गया है। जो कि पर्यावरण पर नतीजा हुआ कानों पर प्रतिकूल असर के संबंध में वर्णन दिया गया है।
०३- शोर अवांछित ध्वनि के रूप में परिभाषित किया गया है। ध्वनि जो श्रोताओं को प्रसन्न करता है वह संगीत है और जो दर्द और झुंझलाहट का कारण बनता है शोर है। कभी-कभी, कुछ लोगों के लिए संगीत क्या है, दूसरों के लिए शोर हो सकता है।

प्रशानिक अधिकारी दे रहे अनुमति -
मेरा व्यक्तिगत सोचना यह है कि अस्पताल के समीप किसी को भी संगठन को आयोजन की अनुमति नहीं दी जाना चाहिए। इससे सभी को परेशानी होती है खास तौर से मरीजों व अस्पताल स्टॉफ को परेशानी होती है।
आनंद कोपरिहा -एडीएम दमोह

मुझे याद नहीं, दी थी कि नहीं अनुमति -
आज जो भी कार्यक्रम हुआ है उसकी मुझे याद नहीं है कि मैंने अनुमति दी है कि नहीं। लेकिन आगे कभी भी अस्पताल चौक पर किसी भी कार्यक्रम की अनुमति नहीं दी जाएगी।
डॉ. सीपी पटैल -एसडीएम