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इस लॉकडाउन में जहां लोगों का निकलना मना है वहीं इस महिला स्व सहायता समूह ने इस तरह कमाए लाखों

जय मां काली स्व-सहायता समूह का गठन कर vegetables, laddus, pickles बेच कर कमाया लाखों का मुनाफा

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इस लॉकडाउन में जहां लोगों का निकलना मना है वहीं इस महिला स्व सहायता समूह ने इस तरह कमाए लाखों

इस लॉकडाउन में जहां लोगों का निकलना मना है वहीं इस महिला स्व सहायता समूह ने इस तरह कमाए लाखों

दंतेवाड़ा . भूख प्यास से व्याकुल तीन बच्चों को लेकर दर बदर की ठोकरें खाते सुशीला बेचेन थी। ना सिर पर छत और ना तन ढक़ने को बेहतर कपड़े। जितनी मजदूरी करके कमाते वह 5 सदस्यों के परिवार के लिए पर्याप्त नहीं होता। जैसे तैसे कर के सुशीला अपना और अपने बच्चों का पेट पालती। इस बीच स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना ने सुशीला की किस्मत ही बदल दी। दंतेवाड़ा जिले के गीदम ब्लॉक के छोटे से गांव सियानार की दीदी सुशीला मरकाम की जिनकी आर्थिक स्थिति पहले अच्छी नहीं थी। पेशे से मजदूर पति भी मजदूर दोनों ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा था। अपनी टूटी-फूटी घर गृहस्थी चला रहे थे। कई दिनों महीनों तक गांव से दूर अस्थाई घर, तंबू में रहना पड़ता था। बच्चों के बड़े हो जाने से घर की अर्थव्यवस्था और चरमरा गई। ऐसे में सुशीला को स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के बारे में पता चला तब उसने 1 जनवरी 2010 को आसपास की महिलाओं के साथ मिलकर जय मां काली स्व सहायता समूह का गठन किया। 2015 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन में पंजीकृत होकर नए योजनाओं के साथ लाभ में जुड़े।

बिहान परियोजना का आगमन
सुशीला दीदी के बिहान योजना में जुडऩे उपरांत इन्हे जानकारी दी गई कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत इन्हे पंच सुत्रो का पालन करना होगा। जिसके पश्चात् बैंक से 6 माह के भीतर ऋण प्राप्त होगा और इसके माध्यम से समूहों के सदस्य अपने पृथक व्यापार के लिए समूह से ऋण प्राप्त कर स्वतंत्र व्यापार की स्थापना कर पाएंगे। इन्होने अन्य महिलाओं को समूह से जुडऩे हेतु आमंत्रित किया और इस कार्य में ये सफल भी हुई। तकरीबन 1 साल उपयुक्त प्रशिक्षण प्राप्त कर बैंक लिंकेज की राशि से एक लाख का ऋण प्राप्त हुआ। समूह को प्राप्त राशि से इन्होने ऋण लेके साग सब्जी का व्यवसाय शुरू किया। वहीं कुछ राशि का उपयोग बच्चो के शिक्षा मे किया।

वर्तमान मे इनके साग-सब्जी के व्यवसाय है। ये अपने बच्चों को शिक्षित बना चुकी है एवं इनका खुद का मकान भी है। इनका राशन कार्ड न होते हुए भी ये अपने परिवार का खर्चा इस व्यवसाय से सुचारु रूप से चला लेती है। अभी वर्तमान मे ये इस व्यवसाय से साप्ताहिक 1500 से 2000 रूपए कमा लेती है।

साग-सब्जी उत्पादन
सुशीला ने समूह से ऋण लेकर अपने थोडे से बाड़ी में साग-सब्जी उत्पादन के लिए शासकीय योजनाओं से लाभ लेते हुए पिछले 3 सालों से यह व्यवसाय कर रही है। इस गतिविधि में लगभग 30 से 40 हजार लगाकर लगभग एक लाख 50 हजार रुपए लाभ कमा चुकी है। अभी वर्तमान में इनके खेत मे मिर्च, करेला, बर्बट्टी, भिंडी आदि लगी हुई है और व्यवसाय भी निरंतर चल रहा है।

लड्डू, आचार का व्यवसाय
सुशीला अपने घर के सदस्यो के सहयोग से कुटीर स्तर पर ही लाई लड्डू, आम, कठहल के अचार बना कर उपयुक्त दर पर बिक्री कर लगभग 10 से 12 हजार रुपए कमा लेती है। इस महामारी के समय दीदी के समूह द्वारा मास्क सिलाई कर किफायती दरो पर आम जनता को उपलब्ध कराया जा रहा है। जिससे समूह को फायदा भी पहुंचा रही है और आस-पास के आम जनो का सुरक्षा भी हो रहा है।