
बैलाडीला की पहाड़ियों के पीछे उपेक्षित बस्तर (photo source- Patrika)
CG Tribal Issues: किरन्दुल जिले के बैलाडीला क्षेत्र की लौह अयस्क संपन्न पहाड़ियों के पीछे बसे सैकड़ों गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। तराई में बसे लावा, पुरेंगेल, बड़ेपल्ली और बेंगपाल जैसे गांवों तक न तो सरकार की योजनाएं प्रभावी रूप से पहुंच पाई हैं और न ही मूलभूत सुविधाएं। ये गांव आज भी उस भारत की तस्वीर पेश करते हैं, जहां आजादी के दशकों बाद भी जीवन संघर्ष बनकर रह गया है।
हाल ही में पहली बार इन दुर्गम गांवों तक किसी कलेक्टर का पहुंचना यहां के लोगों के लिए उम्मीद की एक नई किरण लेकर आया। कलेक्टर देवेश कुमार ध्रुव ने जब इन क्षेत्रों का दौरा किया, तो प्रशासनिक तंत्र की वास्तविक परीक्षा सामने आई। उनके दौरे के बाद मेडिकल और महिला एवं बाल विकास की टीम ने 9 किलोमीटर लंबा पैदल सफर तय कर घने जंगलों और पहाड़ियों को पार करते हुए लावा गांव तक पहुंच बनाई। यहां जो दृश्य सामने आए, वे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाले थे। अत्यंत गरीबी, कुपोषण और अभाव में जीवन जीते लोग और उनमें सबसे दर्दनाक तस्वीर थी चार साल की मासूम बच्ची ‘छोटी’ की।
राज्य सरकार द्वारा कुपोषण से निपटने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। वर्ष 2026-27 के बजट में सक्षम आंगनबाड़ी एवं पोषण योजना के तहत बड़ी राशि का प्रावधान भी किया गया है, लेकिन इन दूरस्थ गांवों में योजनाओं का लाभ पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है।
मेडिकल टीम ने संवेदनशीलता दिखाते हुए छोटी की मां को समझाया और पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी), सीएचसी कुआकोंडा में भर्ती कराने के लिए राजी किया। वहां अब बच्ची का इलाज चल रहा है, उसे पौष्टिक आहार मिल रहा है और उसकी स्थिति में सुधार भी दिखने लगा है। यह बदलाव उम्मीद जगाता है, लेकिन यह कहानी अकेली नहीं है।
छोटी, पिता नंदा और मां मंगली की बेटी, अपनी जर्जर झोपड़ी में कुपोषण से जूझ रही थी। उसके पतले हाथ-पैर, फूला हुआ पेट और बुझी हुई आंखें उस कठोर सच्चाई को बयां कर रही थीं, जिसे हम अक्सर आंकड़ों में नजरअंदाज कर देते हैं। वह ठीक से आंखें भी नहीं खोल पा रही थी। उसकी तस्वीर सामने आते ही यह सवाल हर किसी के मन में उठा—क्या यही है हमारा भारत?
इन क्षेत्रों ने वर्षों तक नक्सलवाद का दंश झेला है, लेकिन विकास की कमी के लिए केवल नक्सलवाद को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। 1947 में देश आजाद हुआ, 1968 में बैलाडीला में खनन शुरू हुआ, और 1980 के दशक में बस्तर में नक्सलवाद ने पैर पसारे। अगर उस समय से ही इन आदिवासी इलाकों के विकास पर गंभीरता से काम किया जाता, तो आज तस्वीर कुछ और हो सकती थी।
सडक़, स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण जैसी मूलभूत सुविधाएं आज भी इन गांवों के लिए सपना हैं। यदि इन बीहड़ इलाकों तक विकास पहुंचाना है, तो सबसे पहले वहां तक सडक़ पहुंचाना अनिवार्य है। सडक़ ही वह माध्यम है, जो प्रशासन, स्वास्थ्य सेवाओं और योजनाओं को इन गांवों तक पहुंचा सकती है।
छोटी की कहानी सिर्फ एक बच्ची की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जिसे अब आत्ममंथन की जरूरत है। जब तक हर ‘छोटी’ तक पोषण, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन नहीं पहुंचता, तब तक विकास के दावे अधूरे ही रहेंगे।
Published on:
21 Mar 2026 12:25 pm
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