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चांदी, पीतल, रक्त चंदन, श्वेतचंदन और अब सागौन से बनी पालकी, इस खजाने में दबा है 500 वर्षों का इतिहास

संस्कृति, परंपरा और पूजा अर्चना के अनूठा तरीका श्रद्धालुओं के लिए आज भी पहेली, पंचमी में भारी संख्या में भक्तों के पहुंचने की उम्मीद।

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Maiya Ki Doli

श्वेत-रक्त चंदन के बाद अब सागौन की बनी डोली, इस खजाने में दबा है 500 वर्षों का इतिहास

दंतेवाड़ा. बावन शक्तिपीठ में से एक मांई दंतेश्वरी से जुड़ी कई क्विदंतियां सामने आती हैं। संस्कृति, परंपरा और पूजा अर्चना के अनूठा तरीका श्रद्धालुओं के लिए आज भी पहेली बना हुआ है। यह समय सेवादारों के लिए और श्रद्धालुओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण और रोचक है। करीब 100 साल बाद मां की डोली बदली जा रही है। पांच सौ वर्षों में महज पांच बार मां की डोली को बदला गया है। मंदिर के पुजारी हरेंद्र नाथ जिया बताते हैं कि डोली से जुड़ा पांच सौ वर्षो का इतिहास खजाने में है।

पहले मांई की डोली चांदी से निर्मित थी। डोली मांईजी को बस्तर दशहरा में शामिल होने यहां से रवाना होती थी। दशहरा के विभिन्न रस्मों में शिरकत करती हैं मांई जी। मांई की डोली का इतिहास भैरम देव महाराज से मिल रहा है। चांदी की डोली में मांई जी ले जाया जाता रहा। इसके बाद उनके बेटे रुद्र प्रताप और रुद्र प्रताप की बेटी प्रफुल्ल देवी के शासन काल में डोली को बदला गया था। इस डोली को पीतल का किया गया। कुछ समय तक इस डोली का अस्तित्व प्रवीर चंद्र भंजदेव के समय में भी रहा।

पीतल की डोली के जीर्ण होने के बाद चंदन की लकड़ी का इस्तेमाल हुआ। रक्त चंदन और श्वेत चंदन की डोली राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के समय से अब तक इस्तेमाल होती रही। एक बार फिर इस डोली को बदला जा रहा है। सोमवार को जिस डोली में पूजा के बाद मांई को सवार किया जाएगा, वह सागौन की होगी। लेकिन इस पर पुजारी ने कहा जल्दी में यही विकल्प था। नवरात्रि के बाद श्वेत चंदन या रक्त चंदन की डोली बनेगी।

गर्भ ग्रह से पहुंचेगी सभा ग्रह डोली
परंपरानुसार पंचमी में मांईजी की पूजा अर्चना होगी। पुजारियों के मुताबिक नई डोली की विशेष पूजा करनी पड़ेगी। पहले डोली को शुद्धिकरण किया जाएगा। उसके बाद डोली में घी का लेप लगाया जाएगा। पश्चात विधिवत मांईजी का यंत्र डोली में विराजित किया जाएगा। मांईजी की डोली मंदिर के सभाग्रह में अष्टमी तक रहेगी। उसके बाद अष्टमी को सलामी के साथ बस्तर दशहरा में शामिल होने रवाना होगी।

तीन सीएफटी सागौन से बनी डोली
मांईजी के नई डोली बेशकीमती मानी जाने वाली सागौन लकड़ी से निर्मित की गई है। डोली बनाने में करीब तीन सीएफटी लकड़ी का उपयोग किया गया है। बताया जाता है कि डोली में प्रतीक स्वरूप चंदन की लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है।

पैदल रवाना होती थी डोली
पुजारियों के मुताबिक 70 के दशक तक बस्तर दशहरा में शामिल होने मांईजी को जगदलपुर पहुंचने में करीब चार दिन का समय लगता था। उस समय मांईजी की डोली के साथ हाथी-घोड़ा के साथ पुजारी व सेवादार पैदल रवाना होता था। इस बीच आंवराभाटा, तिरथूम, मावलीभाटा में मांईजी का पड़ाव होता था। वापसी में भी इतने ही दिनों का समय लगता था। हालांकि आज के इस आधुनिक समय में अब मांईजी एक दिन में ही जगलदपुर पहुंच जाती है।

चतुर्थी में उमड़ा आस्था का रेला
शारदीय नवरात्र में मांईजी की आस्था के साथ ही श्रद्धालुओं का रेला लग रहा है। नवरात्र के चतुर्थी में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी रही। तेज धूप में श्रद्धालु भूखे प्यासे अपनी पारी का इंतजार करते रहे। इधर, करीब सौ साल बाद मांईजी की डोली बदले जाने की खबर के बाद पंचमी में भारी संख्या में भक्तों के पहुंचने की उम्मीद की जा रही है।