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बारसूर में 1100 साल से निभा रहे होली की अनोखी परंपरा, नागवंशी शासकों ने किया था शुरू

बताया जाता है कि यह परंपरा करीब 1100 साल पुरानी है, जो तत्कालीन नागवंशी शासकों के शासनकाल में शुरू हुई थीं। तब बारसूर नागवंशी शासकों की राजधानी हुआ करती थी। अंतिम नागवंशी शासक को काकतीय नरेश अन्नमदेव द्वारा परास्त किए जाने के बाद राजधानी जगदलपुर स्थानांतरित हो गई। लेकिन यह परंपरा आज भी जारी है।

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बारसूर में 1100 साल से निभा रहे होली की अनोखी परंपरा, नागवंशी शासकों ने किया था शुरू

Holika File Photo

दंतेवाड़ा. यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि दक्षिण बस्तर की ऐतिहासिक व पुरातात्विक नगरी बारसूर में दंतेवाड़ा के फागुन मेले की तर्ज पर रोजाना आखेट के स्वांग रचे जाते हैं। हर शाम माता मावली दंतेश्वरी मंदिर से माता की डोली बाजे-गाजे के साथ बत्तीसा मंदिर प्रांगण तक लाई जाती है। फाल्गुन शुक्ल षष्ठी से यह सिलसिला शुरू होता है, जो होलिका दहन तक चलता है। इतना ही नहीं, होलिका दहन की रात्रि लोग रातभर गंवरमार व अन्य आखेट के स्वांग का आनंद उठाते हैं, और तड़के 4 बजे होलिका दहन में शामिल होकर अपने घर लौटते हैं। इसे फागुन जगार या होलिकोत्सव के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि यह परंपरा करीब 1100 साल पुरानी है, जो तत्कालीन नागवंशी शासकों के शासनकाल में शुरू हुई थीं। तब बारसूर नागवंशी शासकों की राजधानी हुआ करती थी। अंतिम नागवंशी शासक को काकतीय नरेश अन्नमदेव द्वारा परास्त किए जाने के बाद राजधानी जगदलपुर स्थानांतरित हो गई। लेकिन यह परंपरा आज भी जारी है।

धुरली गुड़ी के सामने होते हैं कार्यक्रम
तमाम कार्यक्रम दो गर्भगृह वाले बत्तीसा मंदिर के सामने आयोजित होते हैं, जिसे स्थानीय ग्रामीण धुरली गुड़ी के नाम से भी जानते हैं। संभवत: धुरली, धुलेंडी शब्द का अपभ्रंश है। यहां पर बारसूर के विभिन्न पारा, बस्तियों के ग्रामीण जुटते हैं और दिन विशेष के अनुसार लमहा यानि खरगोश, कोडरी, चीतल, गंवर जैसे वन्य जीवों के रूप में तैयार होकर आखेट का स्वांग रचते हैं। इसमें हाका लगाने से लेकर सामने जाल बिछाकर फांसने जैसी पुरानी परंपरा को दिखाया जाता है।

स्थानीय जानकार युवा नरेंद्र नाग के मुताबिक तत्कालीन शासक उस वक्त देश-दुनिया में घट रहे घटनाक्रम को भी स्वांग या अभिनय के जरिए दिखाकर जनता को जानकारियों से अपडेट करवाते थे।

बारसूर का इतिहास
छिंदक नागवंशी शासकों की राजधानी रही बारसूर ऐतिहासिक मंदिरों के लिए विख्यात है। तत्कालीन शासक जगदेकभूषण धारावर्ष के सामंत चंद्रादित्य ने यहां पर बत्तीसा मंदिर व चंद्रादित्येश्वर मंदिरों का निर्माण कराया। इसके अलावा गंग महादेवी ने समलूर व बारसूर के अन्य देवालयों का निर्माण करवाया। यहां पर युगल गणेश प्रतिमा, बत्तीसा मंदिर, मामा भांजा मंदिर समेत कुल 147 मंदिर और इतने ही तालाब तत्कालीन शासकों द्वारा बनवाए गए थे। बारसूर में छिंदक नागवंशी राजाओं ने 1023 से 1324 तक लगभग 300 वर्षों तक शासन किया था।