पटना। लोग डॉल्फिन की एक झलक देखने ओडिशा के चिल्का झील पहुंच जाते हैं, लेकिन बगल में बहने वाली गंगा के डॉल्फिन के बारे में सेाचते भी नहीं हैं। बिहार सरकार ने ढाई साल पहले पटना विश्वविद्यालय में डॉल्फिन रिसर्च सेंटर बनाने का प्रण किया। लेकिन आजतक वो हकीकत में तब्दील नहीं हो सका।
सरकार ने भवन बनाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट अथॉरिटी - आईडीए को 19.16 करोड़ रूपए जारी भी कर दिए। लेकिन अंत समय में पटना विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने हाथ खींच लिए। डॉल्फिन मैन प्रो. आरके सिन्हा के अनुसार विश्वविद्यालय सिंडिकेट में जमीन देने पर विरोध हुआ।
पिछले साल अगस्त में सरकार ने पटना विश्वविद्यालय के कुलपति को सेंटर के लिए बनने वाली समिति के चेयरमैन बनाने तक का ऑफर कर दिया। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब तक जमीन नहीं दी है। सरकार की शर्त सिर्फ इतनी है कि सेंटर ऑटोनोमस हो।
सिकुड़ रही है डॉल्फिन के रहने की जगह
पद्मश्री प्रो. आरके सिन्हा का कहना है कि डॉल्फिन के रहने की जगह लगातार सिकुड़ रही है। ऐसा नदियों में पानी कम होने से हो रहा है। सोन नदी में डॉल्फिन नहीं दिखती है। यही हाल गंगा की अन्य सहायक नदियों का है। ऐसे में डॉल्फिन के रहने की जगह अब गंगा ही बची है। लेकिन अब गंगा में जहाज चलाने की बात हो रही है।
इस पर उनका कहना है कि जहान चले, लेकिन डॉल्फिन को होनेवाले नुकसान को ध्यान में रखना होगा। उनके अनुसार नदियों में पानी का प्रवाह कम हो रहा है। ऐसे में गंगा में जहाज चलेंगे तो डॉल्फिन की इससे टकरा कर मौतें हो सकती हैं। ऐसा चीन में हो चुका है।