दौसा जिले की जनता ने एक बार फिर प्रदेश में चली लहर का साथ दिया। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली थी, लेकिन इस बार बदलाव की बयार ऐसी चली कि भाजपा ने चार सीटों पर वापसी की। कांग्रेस का दौसा धराशायी हो गया और मात्र एक सीट खाते में आ सकी। कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने जीत के लिए पूरा दमखम लगाया था, लेकिन मंत्री भी अपनी सीटों को नहीं बचा सके हैं। गौरतलब है कि 1998 से दौसा जिला प्रदेश की सत्ता के साथ रहा है।
जिले में चुनाव की घोषणा के साथ ही प्रियंका गांधी की सिकराय में हुई सभा से कांग्रेस ने माहौल बनाने की कोशिश की थी, लेकिन लेकिन जन मानस ने इस बार पांच में से चार सीटों से कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया। बदलाव के पीछे यूं तो सीट के अनुसार कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण विधायकों से नाराजगी तथा एंटी इनकमबेंसी है। कांग्रेस ने राजनीति के सभी पुराने दिग्गजों को टिकट दिया था। चेहरे बदले नहीं गए, संभवत: मतदाताओं को यह रास नहीं आया। इस बार जिले से भाजपा के जो चारों विधायक जीते हैं, उनकी यह पहली जीत है। ऐसे में जनता ने इस बार बदलाव करने के हिसाब से मतदान किया है। दौसा सीट पर जो भाजपा के प्रत्याशी थे, वे पहले विधायक रह चुके हैं।
इस बार टिकट बंटवारा, सामान्य वर्ग को टिकट नहीं देना, पुराने चेहरों पर ही दावं लगाना सहित सभी रणनीति में कांग्रेस को मात मिली। भाजपा ने लालसोट, सिकराय, महुवा व लालसोट सीट पर गत बार चुनाव हारने वाले प्रत्याशियों को मौका दिया। इन सभी के प्रति मतदाताओं की सहानुभूति भी रही। वहीं विधायकों से नाराजगी का लाभ भी मिला। हालांकि दौसा में राजनीति के मंझे खिलाड़ी मुरारीलाल मीना को भाजपा मात नहीं दे सकी।
सिकराय सीट पर भाजपा में इस बार एकजुटता दिखाई दी, जिसका लाभ मिला। वहीं गुर्जर मतदाताओं को नाराजगी कांग्रेस पर भारी पड़ी। बांदीकुई में गजराज खटाणा ने अच्छी टक्कर दी, लेकिन भाजपा की बसपा से भागचंद टांकड़ा को पार्टी में शामिल कर टिकट देने की रणनीति कामयाब रही। महुवा में कांग्रेस के ओमप्रकाश हुड़ला को अन्य प्रत्याशियों से नुकसान हुआ। राजेन्द्र अपना वोट बैंक बचाने में कामयाब रहे। लालसोट में रामबिलास मीना को हर वर्ग से बम्पर मत मिले। लालसोट में ‘गेट आउट’ शब्द का शोर भी खूब चर्चा में रहा। दौसा में भाजपा का गत बार 50 हजार से अधिक मतों से पराजित उम्मीदवार पर फिर से दांव लगाना उल्टा पड़ गया।
पूरे जिले में जनमानस ने दौसा में चार नए चेहरे चुने हैं और राजनीति की तस्वीर बदल दी है। अब देखना यह है कि विजेता प्रत्याशी क्षेत्र के विकास, समस्याओं के निराकरण, अपने दावों व वादों को कितना पूरा कर पाते हैं। लोगों को नए जनप्रतिनिधियों से क्षेत्र की तस्वीर बदलने की उम्मीद है।