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दौसा का नरेश गुर्जर बगीचे से हर साल बचा रहा आठ से दस लाख रुपए

राजस्थान के दौसा जिले के बांदीकुई उपखंड के सोमाडा गांव में चार बीघा में फैले हरे-भरे बगीचे में कदम रखते ही यह अहसास हो जाता है कि मेहनत, तकनीक और सोच मिल जाए तो खेती भी करोड़ों के सपने दिखा सकती है। सीआरपीएफ की सरकारी नौकरी छोड़ चुके नरेश गुर्जर आज इसी बगीचे से सालाना […]

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दौसा

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rajesh sharma

Jan 24, 2026

dausa news

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राजस्थान के दौसा जिले के बांदीकुई उपखंड के सोमाडा गांव में चार बीघा में फैले हरे-भरे बगीचे में कदम रखते ही यह अहसास हो जाता है कि मेहनत, तकनीक और सोच मिल जाए तो खेती भी करोड़ों के सपने दिखा सकती है। सीआरपीएफ की सरकारी नौकरी छोड़ चुके नरेश गुर्जर आज इसी बगीचे से सालाना करीब 8 से 10 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं और युवाओं के लिए मिसाल बन चुके हैं।एमएससी उत्तीर्ण नरेश गुर्जर ने सरकारी नौकरी की बजाय उद्यमिता का रास्ता चुना। वर्ष 2019-20 में उन्होंने चार बीघा भूमि पर आईसीएआर-आईआईएचआर से बेर के पौधे मंगवाकर बागवानी की शुरुआत की। पहले ही साल मुनाफा मिलने के बाद उन्होंने अमरूद, बेर, मौसमी, चीकू सहित कई फलों का उत्पादन शुरू किया। आज उनका बगीचा आधुनिक बागवानी का मॉडल बन चुका है।

पत्नी मीना भी कर रही सहयोग

नरेश की बागवानी में स्नातक तक पढी पत्नी मीना गुर्जर भी पूरा सहयोग कर रही है। बगीचे में अरका किरण किस्म के अमरूद के करीब 700 पौधे लगे हैं। पहले यह संख्या 300 थी, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाया गया। इस किस्म की खासियत यह है कि फल मीठा, कुरकुरा होता है और सामान्य तापमान में 20 से 25 दिन तक खराब नहीं होता। सबसे बड़ी बात, इसमें साल में दो बार फल आता है। पहली तुड़ाई जनवरी के अंत तक और दूसरी जून में होती है। अब नरेश ब्लैक डायमंड ग्वावा पर भी ट्रायल कर रहे हैं, जिससे उत्पादन और मूल्य दोनों बढ़ने की उम्मीद है।

बेर, मौसमी, चीकू के साथ नई किस्मों पर फोकस

बगीचे में मिस इंडिया, कश्मीरी रेड एप्पल और ग्रीन थाई एप्पल किस्म के बेर के करीब 600 पौधे हैं। इसके अलावा मौसमी और चीकू के सैकड़ों पौधे लगाए गए हैं। यहां उत्पादित फल न सिर्फ राजस्थान बल्कि पंजाब, दिल्ली और उत्तराखंड तक भेजे जाते हैं। पिकअप और ट्रकों के माध्यम से नियमित सप्लाई होती है, जिससे किसानों और व्यापारियों में नरेश की अलग पहचान बन गई है।

जैविक खेती और ड्रिप सिस्टम से बढ़ी गुणवत्ता

नरेश गुर्जर बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति से खेती कर रहे हैं, जिसके लिए उन्हें सरकार से 75 प्रतिशत अनुदान मिला। वे पूरी तरह जैविक खाद का उपयोग करते हैं, जिससे फलों की गुणवत्ता बनी रहती है और बाजार में बेहतर दाम मिलता है। कीट नियंत्रण के लिए फ्लाई ट्रैप और सीमित दवाओं का उपयोग किया जाता है। पौध लगाने के एक साल के भीतर ही फल आना शुरू हो जाते हैं, जिससे निवेश जल्दी वसूल हो जाता है।

सेब और जामुन पर भी नया प्रयोग

नरेश नवाचार से पीछे नहीं हैं। वे जामुन की केजीटेन किस्म, जिसमें एक फल का वजन करीब 100 ग्राम तक होता है, का ट्रायल कर रहे हैं। इसके साथ ही सेब की खेती पर भी प्रयोग जारी है। उनका मानना है कि नए प्रयोग ही किसान को बाजार में आगे रखते हैं।

दर्जनों लोगों को मिल रहा रोजगार

बगीचे के संचालन में परिवार के सदस्य तो जुड़े ही हैं, साथ ही गुड़ाई, कटिंग, हार्वेस्टिंग जैसे कार्यों के दौरान दर्जनों लोगों को रोजगार मिलता है। फल तुड़ाई के समय उत्तराखंड से प्रशिक्षित श्रमिक भी बुलाए जाते हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

अन्य किसानों को भी कर रहे प्रशिक्षित

खेती के साथ-साथ नरेश गुर्जर किसानों को आधुनिक बागवानी के लिए प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। वे उन्हें उच्च उत्पादन वाली किस्मों के पौधे उपलब्ध कराते हैं और सरकारी योजनाओं की जानकारी भी देते हैं। कृषि पर्यवेक्षक मुरारी लाल और सहायक कृषि अधिकारी उदल सिंह गुर्जर के मार्गदर्शन से उन्होंने विभिन्न योजनाओं का लाभ उठाकर यह मॉडल तैयार किया।

अनुदान का भी फायदा

किसानों को ड्रिप सिस्टम से खेती करने पर एक हेक्टेयर भूमि पर 70 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है। यदि किसान परंपरागत खेती के साथ उद्यानिकी योजनाओं को अपनाएं तो उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है। नरेश गुर्जर ने कृषि व उद्यान विभाग की योजनाओं का सही उपयोग कर बागवानी स्थापित की है और आज 8 से 10 लाख रुपए सालाना कमा रहे हैं। अन्य किसानों को भी उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

उदल सिंह गुर्जर, सहायक कृषि अधिकारी, बांदीकुई

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