
Labor Day Special: The 'value' of the laborer does not increase or 'honorarium'
दौसा. मजदूरों के अधिकारों के लिए समर्पित विश्व मजदूर दिवस पर एक मई जिले में श्रम कल्याण विभाग की ओर से भले ही कोई कार्यक्रम आयोजित कर उनके कल्याण की योजनाएं गिनाएं, लेकिन जिले के अधिकतर मजदूर आज भी इन योजनाओं के लाभ से महरूम है।
विभाग की ओर से श्रमिकों को योजनाओं का लाभ देने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए जाते हैं। इससे अधिकतर मजदूरों को उनके कल्याण के लिए संचालित योजनाओं की जानकारी नहीं लग पाती है और वो दिनभर तपती धूप में मेहनत-मजदूरी कर परिवार का पेट पालने का जुगाड़ करते हैं। ऐसे में जिले के मजदूरों की स्थिति आज भी एक दशक पुरानी जैसी ही है।
मजदूर आज भी दिनभर पसीना बहाने के बाद शाम को परिवार की रोटी का जुगाड़ करने लिए मालिक का मुंह ताकता है। जब उसको परिवार को शाम की रोटी मिल जाती है तौ फिर उसको रात को ही दूसरे दिन की रोजी की चिंता सताने लगती है। ना उनको सरकारी नौकर की तरह छुट्टियां मिलती है और ना ही अन्य सुविधाएं।
खास बात यह है कि 1 मई का दिन मजदूर दिवस के रूप में घोषित है, लेकिन मजदूरों के लिए यह सामान्य दिन जैसा ही रहता है। विभाग की ओर से उनके हाल जानने तक का प्रयास नहीं किया जाता है।
सबसे बड़ी योजना में भी मजदूरों पर ध्यान नहीं
देश में इस वक्त मजदूरों को रोजगार देने के लिए मनरेगा योजना से बड़ी कोई योजना संचालित नहीं है। सरकार ने इस योजना को वर्ष 2005 से लागू किया था। उस वक्त तो मजदूरों के हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य स्थल पर छाया के लिए टैंट लगाए गए थे। उनके स्वास्थ्य के लिए दवाइयां उपलब्ध कराई गई थी।
महिला मजदूरों के बालकों के लिए पालने भी भिजवाए थे, लेकिन अब इस योजना में काम करने वाले मजदूरों के लिए न तो टैंट मिलता हैऔर ना ही दवाइयां। ऐसे में इस योजना में काम करने वाले मजदूरों की हालत बिगड़ती जा रही है।
औद्योगिक इकाइयों की हालत खराब
औद्योगिक इकाइयों की रीढ़ मजदूर ही होता है। मालिक चाहे कितनी भी अच्छी मशीन क्यों नहीं ले आए, जब तक मजदूर नहीं हो सब व्यर्थ है। दौसा में अगर मजदूरों की बद्तर स्थिति देखी जाए तो बापी औद्योगिक इलाके से अधिक कहीं भी नहीं है। यहां पर दिनभर पत्थरों के पाउडरों की धूल उड़ती रहती है। इस खतरनाक काम के लिए न तो उनको मास्क दिए जाते हैं और ना ही हेलमेट।
बस मालिक को उनसे काम के अलावा कुछ नहीं चाहिए। यही नहीं सिकंदरा का स्टोन पार्क पत्थर एवं मूर्ति व्यवसाय भले ही देश ही नहीं विश्व के मानचित्र पर छाया हुआ है, लेकिन यहां भी मजदूरों की स्थित खराब ही है। मजदूरों को यहां भी न तो मास्क दिए जाते हैं और नहीं उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाता है। हालात यह है कि अनदेखी के चलते दर्जनों मजदूर मौत के मुंह में चले गए हैं।
मजदूरों की जुबानी...
दौसा में बजरी भर रहे मुकेश मीणा ने बताया कि मजदूर दिवस क्या होता है। वह रोज घर से बजरी भरने के लिए आता है और दिनभर काम कर घर लौट जाता है। वर्षभर यही सिलसिला चलता रहता है। सरकार की ओर से कोई भी सुविधा नहीं दी जा रही है।
चिनाई का काम करने वाले मुकेश बैरवा ने बताया कि अब तो मजदूरी भी मुश्किल से मिल पाती है। दिनभर मजदूरी करने के बाद शाम को मुश्किल से 300 रुपए मिल पाते हैं। सरकार को उनसे कोई सरोकार नहीं है।
रामकेश गुर्जर ने बताया कि वह दिहाड़ी मजदूरी करता हैं तो परिवार का पालन-पोषण नहीं हो पाता है। बाहर काम करने जाते हैं, तो ठेकेदार समय पर मजदूरी नहीं देते हैं। मजदूर के हाल खराब हो रहे हैं। गार्ड का काम करने वाले भरतलाल ने बताया कि उनको दो सौ रुपए प्रति दिन पर काम करना पड़ रहा है। दिनभर खड़ा रहने के बाद भी समय पर पैसा नहीं मिल पाता है।
कार्रवाई हुई ना दी योजनाओं की जानकारी
जिले में बापी, कौलाना, लालसोट के डिडवाना में औद्योगिक कारखाने हैं। सिकंदरा में स्टोन व लवाण में दरी व खिलौने बनाने का काम चल रहा है। हजारों की संख्या में जिले में मजदूर है।
उद्योगपतियों ने मजदूर दिवस पर यहां पर न तो मजदूरों के लिए अवकाश रखा और ना ही उनके कल्याण के लिए कोई कार्यक्रम आयोजित किए। फैक्ट्रियों में मजदूर आम दिनों की तरह काम करते देखे गए।
मजदूरों के हितों की कई योजनाएं
मजदूरों के हितों में सरकार ने कई योजनाएं संचालित कर रखी है। अब तो श्रमिक कार्ड भी बनने लग गए हैं। उनको कई फायदे मिलते हैं। एक मई को मजदूर दिवस पर कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
आरएल मीना, जिला श्रम अधिकारी दौसा
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