
independence day
दौसा. जिला मुख्यालय से मात्र १० किलोमीटर दूर छोटे से गांव बनेठा ने दौसा का नाम पूरे देश में रोशन कर रखा है। यहां का बुना कपड़ा देशभर में लहराए जा रहे तिरंगे के काम आ रहा है। हालांकि देश में यहां के अलावा कर्नाटक के हुबली एवं महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में भी कुछ बुनकर झण्डा क्लॉथ तैयार कर रहे हैं, लेकिन दौसा का सौभाग्य रहा कि देश की आजादी के समय वर्ष १९४७ में दिल्ली के लालकिले की प्राचीर पर जो पहला तिरंगा लहराया था, उसका कपड़ा दौसा के आलूदा गांव के चौथमल व नानगराम महावर ने बुना था। सूत्रों की माने तो आज भी यह झण्डा दिल्ली में सुरक्षित रखा हुआ है।
नहीं हो रहा है विकास
दौसा पंचायत समिति के बनेठा गांव में संकरे व कीचडय़ुक्त रास्तों में प्रवेश करने पर छोटे-छोटे मकान व उनमें लगे हथकरघे नजर आएंगे। इस तंग बस्ती में भारत के राष्ट्रीय ध्वज का कपड़ा बुनने वाले कारीगर रहते हैं। वर्षों से यहां के कारीगर देश के लिए तिरंगे का कपड़ा (झण्डा क्लॉथ) बुन रहे हैं, लेकिन उनकी आर्थिक, शैक्षिक व कॉलोनी विकास की स्थिति बदतर है। उनके बालकों को कोई खास सुविधा नहीं मिल रही है और नहीं उनको भी खादी की ओर से कोई खास सुविधाएं नहीं मिल रही है।
यहां पर १४ परिवार इस कपड़े की बुनाई में सालभर लगे रहते हैं। पत्रिका टीम ने जब यहां के कारीगरों से तिरंगे का कपड़ा बुनने के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उनके गांव में बुना झण्डा क्लॉथ पूरे देश में तिरंगे के रूप में शान से लहराया जा रहा है। बुनकरों को गर्व है कि उनका बुना कपड़ा देश के तिरंगे के काम का आ रहा है। कारीगरों ने दबे स्वर में कहा कि वे जब से खादी का कपड़ा बुन रहे हंै तब भी उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी थी और आज भी उसी स्थिति में हैं। गौरतलब है कि दौसा खादी समिति के अधीन थूमड़ी, छारेड़ा, कालीखाड़, रजवास, नांगलराजावतान, दौसा व आलूदा में भी बुनकर है, लेकिन झण्डा क्लॉथ सिर्फ बनेठा में ही बुना जाता है।
आलूदा पर नहीं दिया ध्यान
देश की आजादी के बाद पहली बार दिल्ली के लालकिले की प्राचीर पर जो तिरंगा लहराया था, वह कपड़ा दौसा के आलूदा गांव के भौंरीलाल महावर, चौथमल व नानगराम ने बुना था। यानि उस समय तिरंगे के लिए देशभर की कई खादी समितियों से कपड़ा गया था, लेकिन चयन आलूदा के कपड़े का ही हुआ था। आज स्थिति यह है भौंरीलाल व उसके भाई तो नहीं है, लेकिन खादी की ओर से संरक्षण नहीं मिलने से उनके परिवार ने खादी से मुंह मोड़ लिया है। जगदीश महावर व पूर्व सरपंच जुगल मीना ने बताया कि यदि सरकार आलूदा में ध्यान देती तो लोगों को रोजगार मिलता।
इसलिए बनेठा में बुनता है झण्डा क्लॉथ
बनेठा में तिरंगा का कपड़े बुनने वाले मूलचंद महावर ने बताया कि उनको दौसा खादी भण्डार से कच्चा सूत मिलता है। वें यहां पर पानी में गेहूं का आटा मिला कर उसमें इस सूत को मिला कर सुखाते हैं। इससे कपड़े में निखार आता है। सूत्रों की माने तो यहां के पानी भी खासियत है कि गेहूं का आटा मिलाने के बाद सूत को भिगोया जाता है तो इस कपड़े में अलग ही निखार आता है।
फिर भी वे बुनते हैं झण्डा क्लॉथ
बनेठा निवासी किशोरी लाल महावर ने बताया कि उनके परिवार में कई वर्षों से इस कपड़े को बुना जा रहा है। हालांकि उनको कपड़े की बुनाई में कोई खास आमदनी नहीं होती है, फिर भी इस बात पर गर्व है, कि उनका बुना कपड़ा देश की शान है। उन्होंने बताया कि साढ़े 15 मीटर लम्बे कपड़े का थान बुनने में उनको करीब ढाई सौ रुपए मिल पाते हंै। एक थान कपड़ा दो दिन बिना नहीं बुना जा सकता है। इसलिए वे कपड़ा बुनाई के साथ-साथ दूसरा काम भी करते हंै। ताकि घरेलू खर्च चलता रहे।
आधुनिकतता में भी पुराने औजार
बनेठा में जो कारीगर झण्डा क्लॉथ तैयार कर रहे हैं, उनको भी हथकरघा हाथ से ही चलाना पड़ रहा है। जबकि इस आधुनिकता में उनके लिए कपड़ा बुनने के लिए नए करघे आने चाहिए। उनको किसी प्रकार का प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता है।
हरसम्भव सहायता की जाती है
बनेठा में करीब एक दर्जन से अधिक परिवार खादी के तिरंगे का कपड़ा हथकरघे से बुनते हैं। यहां के कुशल कारीगर काफी समय से यह कपड़ा बुन रहे हैं। हालांकि दौसा में खादी का काम बड़े स्तर पर है। 1947 में आजाद भारत का पहला तिरंगा आलूदा के कारीगरों ने ही बुना था। देशपाण्डे दौसा से यह कपड़ा मुम्बई लेकर गए थे। वहां पर उसकी प्रिंटिंग हुई थी।
अनिल शर्मा, मंत्री खादी समिति दौसा
Published on:
14 Aug 2017 09:35 pm
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