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छह पीढ़ी बाद भी काबलेश्वर किले का सौन्दर्य बरकरार

कभी थी 13 सौ बीघा जमीन, अब तीस में सिमटी

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Six generations later, Kabaleeshwar fort retains beauty

सैंथल. जिला मुख्यालय से मात्र बीस किलोमीटर दूर गांव काबलेश्वर स्थित प्राचीन किला आज भी सैंथल क्षेत्र में पहचान बनाए हुए हैं, वहीं पूर्वजों द्वारा कराए गए इस किले के निर्माण के बाद अब पीढ़ी दर पीढ़ी यह किला पहले की तरह ही नजर आता है।

खास बात यह है कि इतना पुराना किला होते हुए भी आज भी इस क्षेत्र में आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। यह किला जयपुर दरबार माधोसिंह ने ठाकुर भीमसिंह जो जयपुर स्टेट के अन्तर्गत कार्य करते थे। उनके कार्य से खुश होकर भीमसिंह को यह जागीरी मिली। उसके बाद वर्ष 1838 में इसका निर्माण कराया गया। उस समय यह किला तीन मंजिला बनाया गया था। निर्माण कार्य में पत्थर व चूना ही काम में लिया गया था।
एक दर्जन से अधिक गांव थे अधीन
इस किले के अधीन करीबन एक दर्जन गांव आते थे। जिसकी जागीरी भीमसिंह के पास थी। यह किला चार बीघा पक्की जमीन में बना है किले से 500 मीटर की दूरी पर एक पुरानी छतरी है। इस किले से सुरंग जाती थी, लेकिन उस सुरंग को कुछ वर्षों बाद बन्द करा दिया गया था। इस किले के नीचे करीब 12 हजार बीघा जमीन खेती की थी, लेकिन अब मात्र 30 बीघा जमीन है। छह पीढ़ी गुजर जाने के बाद यहां पर रणविजय सिंह ही अपने परिवार के साथ रहते हैं। रणविजय ने बताया कि हमारे बुजुर्ग भीमसिंह के बाद हेमसिंह, बजरंग सिंह, सज्जन सिंह, रणवीर सिंह , नारायण प्रताप सिंह ने इस किले को पहले की तरह आज तक ज्यो का त्यो बनाए रखा है।
वर्तमान में वक ही इस किले की देखरेख करते है। आज भी इस क्षेत्र के लोग मान-सम्मान देते हैं।

इस किले में बाहर के पर्यटक भी आते रहते हैं। कई बार फि ल्मों व सीरियलों की शूटिंग भी की जाती है। आज भी किले में प्राचीन केरोसिन लैम्प हैं। जो आज भी जलते हैं। किला निर्माण के बाद बीकानेर की जेल के कैदियों द्वारा बनाई गई दरिया भी मौजूद हैं। पुराने भाले तलवार, राइफल भी यहां पर मौजूद है। भाले व तलवार भी मौजूद हैं।