गत वर्ष 2017 में रुई का भाव 115 रुपए किलोग्राम था, जो कि अब बढ़कर150 रुपए किलो तक पहुंच गया है। रजाई-गद्दों में रुई धुनाई से लेकर तैयार करने तक की मजदूरी 120 रुपए तय है। ऐसे में एक मजदूर एक दिन में पांच-रजाई गद्दे भर देता है, लेकिन मेहनत के अनुसार मेहनताना नहीं मिल पा रहा है। जबकि इसी में धागा एवं रूई धुनाई भी शामिल है। ऐसे में मजदूरी नहीं निकलने पर रजाई-गद्दे एवं तकियों की खोलियां भी रखकर बेचना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि पहले रजाई की खोली की कीमत 150 से 250 के बीच थी, जो कि अब बढ़कर तीन सौ रुपए को पार कर गई है। उन्होंने बताया कि सिकंदरा, राहुवास, किशनगढ़ की रजाई व इरोड़, सोलापुर एवं कानुपर के गद्दों की मांग अधिक बढ़ रही है।