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Rajasthan Unique Holi: राजस्थान में यहां धुलंडी के अगले दिन खेली जाती है होली, जानें सदियों पुरानी अनोखी परंपरा

Pawata Dolchi Holi: राजस्थान के दौसा जिले में धुलंडी के अगले दिन सदियों पुरानी परंपरा उत्साह से निभाई जाती है। यहां की डोलची होली देखने देशभर से लोग पहुंचते हैं।

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दौसा

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Anil Prajapat

Mar 02, 2026

Dolchi Holi

डोलची होली खेलते हुए। पत्रिका फाइल फोटो

Dolchi Holi Rajasthan: दौसा जिले के पावटा गांव में होली की दूज पर सदियों पुरानी परंपरा उत्साह से निभाई जाती है। यहां की डोलची होली देखने देशभर से लोग पहुंचते हैं। हदीरा मैदान में गुर्जर समाज के दो गांवों के युवा वो दल बनाकर उतरते हैं और पानी की बौछारों से प्रहार करते हैं। आइए जानते हैं सदियों पुरानी इस अनोखी परंपरा के बारे में।

दरअसल, हजारों सालों से बल्लू शहीद की याद में महुवा उपखंड के पावटा गांव में डोलची होली खेली जाती है। बुजुर्गों का कहना है कि हजारों साल पहले दो समुदायों में हुए आपसी झगड़े के दौरान पावटा गांव के बल्लू सिंह का सिर काट दिया था। इसके बावजूद भी वो विपक्षी सेना से लड़ते रहे और जब तक उन्होंने दूसरी सेना का खात्मा नहीं कर दिया, तब तक लड़ते रहे। उनकी याद में पावटा में हर साल डोलची होली का आयोजन होता है।

एक महीने पहले शुरू हो जाती है तैयारियां

डोलची होली की तैयारियां पावटा गांव में एक महीने पहले शुरू हो जाती है। युवा अपनी पीठ पर पहले से ही हल्दी एवं तेल की मालिश करवाते है, तो डोलची यानी चमड़े के पात्र को भी 15 दिन पहले तेल पिलाना शुरू कर देते है। ऐसा करने से डोलची नरम रहती है।

ऐसे खेलते है डोलची होली

पावटा गांव में आज भी दो सेनाएं तैयार होती हैं, जिनके हाथ में चमड़े की डोलची और रंग की बाल्टी होती है। एक सेना पीलवाड़ पट्टी और दूसरी जिंद पार्टी की ओर से आती है। इस दौरान एक दूसरे की पीठ पर डोलची से बौछार मारकर शहीद बल्लू सिंह के नारे लगाए जाते हैं।

यह अनोखी होली गांव के हदिरा मैदान में आयोजित होती है, जहां दडगस और पीलवाड़ गोत्र के युवा आमने-सामने होकर डोलची होली खेलते है। इसे खूनी होली के नाम से भी जाना जाता है। डोलची होली के बाद देवर-भाभी की होली भी खेली जाती है, जिसमें भाभी देवरों पर डोलची से प्रहार करती हैं। इसके बाद ढोला मारू की सवारी निकाली जाती है।

एक बार होली नहीं खेली तो गांव में पड़ा था अकाल

बुजुर्ग बताते है कि एक बार किसी कारण से डोलची नही खेली गई थी। तब पूरे गांव को प्राकृतिक आपदाओं ने घेर लिया था और गांव में अकाल पड़ गया था। इसके बाद ग्रामीणों ने बल्लू शहीद के स्थान पर जाकर मन्नतें मांगी थी और हर साल हर साल धूलंडी के अगले दिन डोलची होली खेलने की शपथ ली थी, तब जाकर आपदाओं से छुटकारा मिला था। इसके बाद से यहां अनवरत डोलची होली खेली जाती है।