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गांव नहीं पहुंच पाया शहीद का शव, बेटे के अंतिम दर्शन को चार किमी पैदल चले बुजुर्ग माता-पिता, जानें वजह  

Martyrdom : जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए शहीद हवालदार गजेंद्र सिंह गड़िया का पार्थिव शरीर पैतृक गांव तक नहीं पहुंच पाया। बेटे के अंतिम दर्शन के लिए बुजुर्ग माता-पिता और अन्य परिजनों को चार किमी पैदल चलना पड़ा और वहां से 13 किमी सफर वाहन से तय करना पड़ा। गांव की तमाम महिलाएं और बुजुर्ग भी शहीद के दर्शन नहीं कर पाए।

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The body of Havildar Gajendra Singh Gadiya, who was martyred in Kashmir, could not reach his native village of Bithi in Kapkot, Bageshwar

कपकोट में शहीद गजेंद्र सिंह के अंतिम दर्शन करते परिजन और अन्य लोग

Martyrdom : जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में बीते रविवार को आंतकियों और सेना के बीच भीषण मुठभेड़ हुई थी। आतंकियों के ग्रेनेड हमले में सेना के आठ जवान घायल हो गए थे, जिन्हें एयरलिफ्ट कर अस्पताल पहुंचाया गया था। उपचार के दौरान उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र के बीथी गांव निवासी पैरा ट्रूपर हवादार गजेंद्र सिंह गड़िया ने अंतिम सांस ली थी। इससे पूरे गांव में कोहराम मच गया था। मंगलवार को उनका शव पैतृक गांव बीथी लाया जाना था। गांव के लिए सड़क नहीं होने के कारण उनका शव कपकोट पहुंचाया गया था। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण शहीद उस मिट्टी से नहीं मिल पाया जिस पर उसने जन्म के बाद पहला कदम रखा था। कई रिश्तेदार और ग्रामीण वीर जवान के आखिरी दर्शन नहीं कर सके। सड़क के अभाव में बेटे के अंतिम दर्शन के लिए को बुजुर्ग माता-पिता को चार किमी पैदल चलकर कपकोट आना पड़ा। उनका शव कपकोट तक ही पहुंच पाया था। गांव से उनकी मां चंद्रावती देवी और पिता धन सिंह करीब चार किमी पैदल चलकर सड़क तक पहुंचे। इसके बाद 13 किमी वाहन से कपकोट के डिग्री कॉलेज तक पहुंचे। वहां उन्होंने अपने लाल के अंतिम दर्शन किए। बेटे का शव देख मां-बाप बिलख उठे। गांव के अन्य पुरुष भी अपने लाल को कंधा देने को कपकोट पहुंच गए, पर गांव की कई लोग शहीद के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पाए। इधर, एसडीएम अनिल चन्याल के मुताबिक सेना के अधिकारियों और शहीद के पिता के टेलीफोनिक वार्ता के बाद डिग्री कॉलेज कपकोट का कार्यक्रम तय हुआ है। इसमें प्रशासन का कोई हस्तक्षेप नहीं था।

अंतिम दर्शन को उमड़ा जनसैलाब

तहसील क्षेत्र के बीथी पन्याती गांव निवासी शहीद हवलदार गजेंद्र सिंह गड़िया का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर मंगलवार को हेलीकॉप्टर से डिग्री कॉलेज मैदान में लाया गया। देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले जांबाज गजेंद्र के अंतिम दर्शन के लिए लोग बेताब थे। परिजनों को अंतिम दर्शन कराए गए। परिजनों की अश्रुपूरित विदाई के बाद शहीद की अंतिम यात्रा शुरू हुई। इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग मौजूद रहे। जब तक सूरज चांद रहेगा, गजेंद्र तेरा नाम रहेगा, भारत माता की जय के उदघोष से कपकोट घाटी गूंज उठी। सरयू और खीरगंगा के संगम पर सैन्य सम्मान के साथ शहीद गजेंद्र की अंत्येष्टि की गई।

देरी से पहुंचा पार्थिव शरीर

शहीद गजेंद्र के पार्थिव शरीर का पहुंचाने में काफी देरी लग गई थी।  मंगलवार की सुबह से ही क्षेत्र के लोग शहीद हवलदार गजेंद्र का पार्थिव शरीर आने का इंतजार कर रहे थे। 11 बजे से लोग डिग्री कॉलेज कपकोट के मैदान में जुटने शुरू हो गए। पहले पार्थिव शरीर को पैतृक गांव ले जाने का कार्यक्रम था। शहीद के पिता भी गांव में ही थे, लेकिन पार्थिव शरीर पहुंचने में विलंब के कारण इस कार्यक्रम में बदलाव कर दिया गया। माता-पिता को भी गांव से कपकोट ही बुला लिया गया। पत्नी और बच्चे पहले से ही यहां मौजूद थे। दोपहर करीब दो बजे हेलीकॉप्टर से शहीद का पार्थिव शरीर यहां लाया गया।