19 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

ना यूरिया के लिए लाइन में लगते हैं ना ही दवाइयों का करते हैं छिडक़ाव

वेस्ट डिकंपोजर के जीवाणुओं को मल्टीप्लाई कर तैयार कर रहे घोलजीरो बजट खेती की और अग्रसर किसान प्रेमसिंह अन्य किसानों को भी कर रहे प्रेरित

2 min read
Google source verification
किसानों को भी कर रहे प्रेरित

जैविक खाद से लहलहाती गेहंू की फसल दिखाते किसान प्रेमसिंह।,जैविक खाद से लहलहाती गेहंू की फसल दिखाते किसान प्रेमसिंह।

लोकेन्द्र सिंह चौहान
सादलपुर. जहां एक और प्रदेश भर में यूरिया खाद के लिए मारामारी मची हुई है । किसानों को लंबी लाइनों में लग कर घंटों इंतजार के बाद भी यूरिया नहीं मिल रहा है वहीं एक किसान यूरिया व डीएपी जैसे रासायनिक खादों के इस्तेमाल से पूरी तरह दूरी बना ली है और खुद ही वेस्ट डिकम्पोजर से घोल तैयार कर जीरो बजट खेती कर रहे है। इससे इन्हें न तो रासायनिक खादों के लिए भटकना पड़ता है और न ही व्यर्थ खर्च करना पड रहा है और कम लागत में ही अन्य किसानों के मुकाबले बेहतर फसल ले रहे है वो भी पूरी तरह जैविक ।
खेती में रासायनिक खादों और रसायन के अंधाधुंध प्रयोग से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही धीरे-धीरे उत्पादन पर भी इसका असर पड़ता है। इस प्रयोग को कम करने के लिए जैविक खादों के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे ही एक किसान है प्रेमसिंह कछवाया जो जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर ग्राम खेरोद में पिछले 3 साल से जैविक खेती को बढावा दे रहे हैं। आठवीं तक पढ़े प्रेमसिंह की जैविक खेती में पकड़ काफी अच्छी है और रासायनिक दवाइयों से हो रहे नुकसान को वे भलीभांति समझते हैं। इसी के चलते अपनी 100 बीघा जमीन पर पूरी तरह रासायनिक खेती न कर जीरो बजट खेती की ओर अग्रसर है ।
इससे इन्हें जहां खेती में कम लागत आ रही है वही रासायनिक दवाइयों का उपयोग करने वाले अन्य किसानों के मुकाबले उत्पादन भी अच्छा मिल रहा है वह भी नाम मात्र के खर्च पर।
इस तरह करते हैं इस्तेमाल : किसान प्रेमसिंह ने बताया कि यह जैविक खाद एक छोटी शीशी में होता है। 200 लीटर पानी में दो किलो गुड़ डालकर इस विशेष जैविक खाद को उसमें मिला दिया जाता है। गर्मियों में दो दिन और सर्दियों में चार दिन तक इसे रखना होता है। इसके बाद इसका इस्तेमाल किया जा सकता है वर्तमान में हम इसे मल्टीप्लाई कर फसलों में सिंचाई के साथ इस घोल को भी छोड रहे हैं, जिससे फसलें लहलहा रही हैं। पिछले 3 सालों से इसी पद्धति से खेती कर रहे हैं। गत वर्ष कम बारिश के बावजूद नौ क्विंटल प्रति बीघा के हिसाब से गेहूं का उत्पादन लिया था जो अन्य किसानों के मुकाबले बेहतर था। किसान प्रेमसिंह अब अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करते है और अगर किसी किसान वेस्ट डिकम्पोस्ट चाहिए तो नि:शुल्क देते भी है और इसके उपयोग करने के तरीके भी बताते है। किसान जैविक खाद वेस्ट डिकम्पोजर का उपयोग कर रहे हैं। इसके परिणाम भी सार्थक आ रहे हैं। इसका अधिक से अधिक प्रयोग करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
जैविक खाद से लहलहाती गेहंू की फसल दिखाते किसान प्रेमसिंह।