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गुमनाम था कालिका माता का मंदिर अब पहुंच रहे हैं पर्यटक

पुरातत्व विभाग की अनदेखी बनी परेशानी

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गुमनाम था कालिका माता का मंदिर अब पहुंच रहे हैं पर्यटक

ग्राम धानी में पूर्व में कालीदेवी मंदिर है। यह मंदिर खुदाई के दौरान प्रकट हुआ था। यदि इस मंदिर की ओर पुरातत्व विभाग ध्यान दे तो यहां पर पर्यटन बढ़ सकता है।

मुकेश सोडानी
धार फाटा . हमारा देश पुरातत्व एवं ऐतिहासिक धरोहर खोता जा रहा है। इन धरोहरों के बारे में पुरातत्व विभाग व प्रशासन ध्यान नहीं दे रहा है। ऐसा ही एक ग्राम धानी में पूर्व में कालीदेवी मंदिर है। यह मंदिर खुदाई के दौरान प्रकट हुआ था। यदि इस मंदिर की ओर पुरातत्व विभाग ध्यान दे तो यहां पर पर्यटन बढ़ सकता है।
धामनोद के समीप ग्राम धानी में सुप्रसिद्ध कालीदेवी मंदिर के बारे में पूर्व में प्रमुखता से समाचार प्रकाशित किया था। अब जनता की जागरूकता के बाद पर्यटक यहां पहुंचने लगे, लेकिन पुरातत्व विभाग की अनदेखी के कारण पर्यटकों को काली देवी मंदिर तक जाने में परेशानी होती है। वहां पर जाने के लिए दिशा ***** और मार्ग जर्जर अवस्था में है। यदि आगे खुदाई की जाए तो मंदिर के बारे में अन्य महत्वपूर्ण अवशेष मिल सकते है। उचित देख-रेख अभाव में यह अपना महत्व खोता जा रहा है।
कहां है यह मंदिर : धार जिले के धामनोद से महज दस किमी दूर एबी रोड पर ग्राम धानी जहां से मात्र चार किमी दूर पूर्व दिशा में कारम नदी है। यहां के आदिवासी क्षेत्र में पहाड़ी के गर्भ में कालिका देवी का मंदिर सदियों पुराना है। वासवी (बलवारी) गांव के समीप बसा यह मंदिर करीब चार सौ वर्ष पुराना है। हालांकि पुरातत्व विशेषज्ञ इसके बारे में सही जानकारी दे सकते हैं। गांव के एक रहवासी ने बताया कि करीब 16वीं सदी में बना यह मंदिर गांव के लोगों से भी अनजान होकर पहाड़ी के गर्भ के अंदर दबा है।
मंदिर में है अद्भूत कला-कृति
मंदिर के आसपास बत्तीस देवी-देवताओं के विचित्र चित्र भी अंकित है। मां कालिका देवी के मंदिर के ठीक सामने चार शेर, दो हाथी भी है एक हाथी शेर के पांव में दबा हुआ अंकित है। गुंबद के चारों और कई शैल चित्र भी हैं। अब यह मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीनस्थ है। पुरातत्व विभाग ने गांव के गनिया पिता जीता को इसकी देख-रेख की जिम्मेदारी दी हैं। ग्रामीणों ने पुजारी भी उसे ही नियुक्त किया है। लोगों ने बताया कि संभवत: मुगलकालीन शासन के दौरान मूर्ति एवं मंदिर तोडऩे के लिए अभियान चल रहे थे, उसी दौरान पहाड़ी में इस मंदिर को ढंक दिया गया होगा।
मंदिर के समीप है सात मात्रा जलस्त्रोत
ग्रामीणों के अनुसार करीब दस वर्ष पूर्व यहां पर एक पुजारी था। तब उसने गर्मी के दिनों में पहाड़ी पर पानी निकलते देखा। पुजारी ने गांव वालों को इसकी सूचना दी। ग्रामीणों ने मंदिर से करीब सौ मीटर की दूरी पर इस जगह खुदाई की। दो फीट की खुदाई पर ही पानी निकल आया, जिसे सात मात्रा का नाम दिया गया है। ग्रा्रमीणों का मत है कि इस पानी से स्नान करनेे पर कई तरह की बीमारियां भी दूर होती है। गर्मियों में भी इस कुंड में पानी भरा रहता है। यह पानी कहां से आता है यह आज तक रहस्य बना हुआ है।
पुरातत्व विभाग की उपेक्षा का शिकार बना मंदिर
मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीनस्थ होने के बावजूद भी उपेक्षा का शिकार है। पुरातत्व विभाग ने महज एक चौकीदार नियुक्त कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। लेकिन यदि यहां पर उचित तरीके से अनुसंधान कर आसपास और खुदाई की जाए तो कुछ नया इतिहास सामने आने की संभावना भी है।