अगर चाहते हैं कष्टों का निवारण तो करें भगवान जगन्नाथ के इस स्त्रोत पाठ
आगामी 14 जुलाई से पुरी के भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा उड़िसा के साथ पूरे देश में धुमधाम से निकाली जायेगी, देश ही नहीं बल्की यह रथयात्रा दुनिया के लगभग 23 देशों में श्रद्धाभाव व समर्पण के साथ भगवान के भक्त निकालते हैं । लगभग 9 दिन तक चलने वाली इस रथयात्रा में श्री जगन्नाथ जी अपने भक्तों का हाल चाल जानने के लिए गर्भ गृह से बाहर निकलते है, सभी भक्त दर्शन कर अपने दुखों को दुर करने की कामना भगवान से करते हैं । कहा जाता हैं कि इन नौ दिनों तक जो भी श्रद्धालु भक्त भगवान के इस- श्री जगन्नाथ स्तोत्र का नित्य पाठ करते है उनकी सभी मनोकामनाएं पुरी हो जाने के साथ कष्टों का निवारण भी हो जाता हैं ।
श्री जगन्नाथ स्तोत्र का पाठ विधि
1- सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण, श्री बलराम जी एवं देवी सुभद्रा जी पंचोपचार पूजन- जल, अक्षत-पुष्प, धुप, दीप और नैवेद्य से पूजन करने के बाद हाथ जोड़कर प्रभु का ध्यान करें ।
2- पूजन के बाद स्त्रोत के पहले दो श्लोक से योगेश्वर श्री कृष्ण, श्री बलराम, और देवी सुभद्रा को दण्वत प्रणाम करें ।
3- पूजन और नमन करने के बाद किसी धुले हुए आसन पर बैठकर भगवान श्री जगन्नाथ जी के इस स्त्रोत का शांत चित्त होकर धीमे स्वर में पाठ करें ।
4- जब तक पाठ चलता रहे तब तक गाय के घी का दीपक भी जलता रहे ।
5- ऐसा कहा जाता कि इस स्त्रोत का सिर्फ एक बार पाठ करने से मानसिक शांति मिलने के साथ अनेक कष्टों का निवारण श्री भगवान जी की कृपा से जल्दी हो जाता है ।
श्री जगन्नाथ स्तोत्र
अथ श्री जगन्नाथप्रणामः
नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने ।
बलभद्रसुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः ।।1।।
जगदानन्दकन्दाय प्रणतार्तहराय च ।
नीलाचलनिवासाय जगन्नाथाय ते नमः ।।2।।
।। श्री जगन्नाथ प्रार्थना ।।
रत्नाकरस्तव गृहं गृहिणी च पद्मा
किं देयमस्ति भवते पुरुषोत्तमाय ।
अभीर, वामनयनाहृतमानसाय
दत्तं मनो यदुपते त्वरितं गृहाण ।।1।।
भक्तानामभयप्रदो यदि भवेत् किन्तद्विचित्रं प्रभो
कीटोऽपि स्वजनस्य रक्षणविधावेकान्तमुद्वेजितः ।
ये युष्मच्चरणारविन्दविमुखा स्वप्नेऽपि नालोचका-
स्तेषामुद्धरण-क्षमो यदि भवेत् कारुण्यसिन्धुस्तदा ।।2।।
अनाथस्य जगन्नाथ नाथस्त्वं मे न संशयः ।
यस्य नाथो जगन्नाथस्तस्य दुःखं कथं प्रभो ।।3।।
या त्वरा द्रौपदीत्राणे या त्वरा गजमोक्षणे ।
मय्यार्ते करुणामूर्ते सा त्वरा क्व गता हरे ।।4।।
मत्समो पातकी नास्ति त्वत्समो नास्ति पापहा ।
इति विज्ञाय देवेश यथायोग्यं तथा कुरु ।।5।।
उक्त प्रार्थना के समाप्त होने पर श्री भगवान के चरणों में पुष्पाजंलि अर्पित करें ।