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बोहरा समाज के धर्मगुरु सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहब की सीख- जिस वतन में रहो, उसके प्रति वफादार रहो । वहां के कायदे-कानून का सख्ती से पालन करों

बोहरा समाज के धर्मगुरु सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहब की सीख- जिस वतन में रहो, उसके प्रति वफादार रहो । वहां के कायदे-कानून का सख्ती से पालन करों

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Shyam Kishor

Sep 14, 2018

bohra samaj

बोहरा समाज के धर्मगुरु सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहब की सीख- जिस वतन में रहो, उसके प्रति वफादार रहो । वहां के कायदे-कानून का सख्ती से पालन करों

बोहरा समाज का सबसे सर्वोच्चतम आध्यात्मिक पद होता हैं "सैयदना" और इन धर्म गुरू के निंयत्रण में समाज के तमाम ट्रस्टों के अलावा मस्जिद, मुसाफिरखाने, दरगाह और कब्रिस्तान के सहित अन्य सभी साखाएं होती हैं ।

बोहरा समाज के सबसे बड़े धर्म गुरू सैयदना साहब का फरमान है कि- सबसे मिलजुलकर रहो, किसी से बैर मत रखो, किसी से नफ्रत सत करों, सबकों अपना भाई समझों, हर कौम के लोगों के साथ मिलजुलकर रहो । सैयदना साहब के इन्हीं उच्च विचारों के चलते समाजजन जिन भी देशों में रहते हैं, वहां के कायदे-कानून का पालन भी सख्ती से करते हैं । इसके चलते बोहरा समाज की एक अलग छवि दुनियाभर में है ।

बोहरा समाज धर्म गुरू सैयदना साहब के श्रेष्ठ विचारों की इसी सोच का सुखद परिणाम है कि बोहरा समाज हिन्दुओं के त्यौहार दीपावली से पूर्व मनाया जाने वाले धनतेरस के पर्व पर अपने बहीखातों पर बिस्मिल्लाह लिखते हैं । सैयदना साहब की सीख है अन्य धर्मों का भी सम्मान करो । इसी के चलते बोहरा समाज के लोग सद्भाव के साथ रहते हैं, और मौला की सीख भरोसा, पाबंदी और नेकनीयत पर चलकर जीवन में कामयाबी भी हासिल करते हैं ।

धर्मगुरु सैयदना साहब

दाऊदी बोहरा समाज के 51वें धर्मगुरु सैयदना ताहेर सैफुद्दीन साहब के घर सन् 1915 में एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया था, जिन्हें सभी 52वें धर्मगुरु डॉ. सैयदना साहब के नाम से जानते हैं । सैयदना साहब का पूरा नाम सैयदना डॉ. अबुल काईद जौहर मोहम्मद बुरहानुद्दीन है । डॉ. सैयदना अधिकांश समय पिता के साथ रहे और उनसे ज्ञानार्जन करते रहे ।


- बोहरा समाज के 52 वें धर्म गुरु सैयदना साहब ने मात्र 13 साल की उम्र में कुरान-ए-मजीद को याद कर लिया था ।
- इन्हें मात्र 17 साल की उम्र में 'हदीयत' रुतबे के सम्मान से सम्मानित किया गया था ।
- 19 साल की उम्र में "माजून" का रुतबा देकर पिता द्वारा उन्हें उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया ।
- सैयदना साहब नें सन् 1936 में दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया था ।
- 1941 में सैयदना साहब को अल-अलीम-उर-रासिक का खिताब दिया गया ।
- 1965 में पिता के इंतकाल के बाद सैयदना साहब बोहरा समाज के 52वें धर्मगुरु बने ।
- डॉ. सैयदना साहब दाई उल मुतलक की गादी पर बैठने से पहले पिताश्री की अंतिम ख्वाहिश पूरी करने के लिए मिस्र गए, जहां भव्य समारोह में चांदी की जरी इमाम हुसैन का सर मुबारक जहां दफन है, वहां स्थापित की । मिस्र की यात्रा के बाद उन्होंने 52वें धर्मगुरु की बागडोर संभाली ।

- दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी में अल-अजहर यूनिवर्सिर्टी ऑफ कैरो, इजिप्ट ने उन्हें डॉक्टर ऑफ इस्लामिक स्टडीज की उपाधि प्रदान की ।
- डॉ. सैयदना साहब को जार्डन की सरकार ने 'स्टार ऑफ जार्डन' के अलंकरण से विभूषित किया ।