
विश्व के अधिपति भगवान महेश्वर के ग्यारह रूद्र रूपों की आराधना शत्रुओं के भय से मुक्ति दिलाती हैं
भगवान रुद्र तो एक ही हैं किन्तु जगत के कल्याण के लिए वे अनेक नाम व रूपों में अवतरित होते हैं । मुख्य रूप से ग्यारह रुद्र हैं । वेदों में शिवजी को अनेक नामों से परिभाषित किया गया हैं, लेकिन सबमें रुद्र नाम ही सर्वश्रेष्ठ माना गया हैं । शिव को ‘रुद्र: परमेश्वर:, जगत्स्रष्टा रुद्र:’ आदि नामों से परमात्मा माना जाता है । यजुर्वेद का रुद्राध्याय तो भगवान रुद्र को ही समर्पित हैं । उपनिषद् रुद्र को विश्व का अधिपति तथा महेश्वर बताया गया हैं । दु:ख का नाश करने तथा संहार के समय क्रूर रूप धारण करके शत्रु को रुलाने के कारण ही शिव को ‘रुद्र’ कहते हैं । शिवपुराण का आधे से अधिक भाग रुद्रसंहिता, शतरुद्रसंहिता और कोटिरुद्रसंहिता आदि नामों से भगवान रुद्र की ही महिमा का गान करते हुए बताया गया की इसके पाठ से शत्रुओं का भय समाप्त हो जाता हैं ।
ग्यारह रुद्र या एकादश रुद्र
शिवपुराण के अनुसार
एकादशैते रुद्रास्तु सुरभीतनया: स्मृता: ।
देवकार्यार्थमुत्पन्नाश्शिवरूपास्सुखास्पदम् ।।
अर्थात्—ये एकादश रुद्र सुरभी के पुत्र कहलाते हैं । ये सुख के निवासस्थान हैं तथा देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए शिवरूप से उत्पन्न हुए हैं ।
आज भी भगवान शिव के स्वरूप ये सभी एकादश रुद्र देवताओं की रक्षा के लिए स्वर्ग में विराजमान हैं और ईशानपुरी में निवास करते हैं । उनके अनुचर करोड़ों रुद्र कहे गये हैं, जो तीनों लोकों में चारों ओर स्थित हैं ।
शिवपुराण में एकादश रुद्र के नाम
कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, शम्भु, चण्ड, और भव ।
शैवागम के अनुसार एकादश रुद्रों के नाम
शम्भु, पिनाकी, गिरीश, स्थाणु, भर्ग, सदाशिव, शिव, हर, शर्व, कपाली, और भव ।
श्रीमद्भागवत में एकादश रुद्रों के नाम
मन्यु, मनु, महिनस, महान्, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव, और धृतव्रत ।
शिवपुराण में कहा गया हैं कि ग्यारह रूद्रों की कथा को एकाग्रचित्त होकर पढ़ने का महान फल प्राप्त होता हैं ।
यह धन व यश देने वाला हैं, मनुष्य की आयु की वृद्धि करने वाला हैं, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला हैं, पापों का नाशक एवं समस्त सुख-भोग प्रदान कर अंत में मुक्ति देने वाला है ।
Published on:
07 Aug 2018 06:00 pm
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